डायरी: रिश्तों का धीरे-धीरे खत्म होना
दिन 1
आज हम फिर बात किए।
सब कुछ ठीक था।
या शायद मैं मान लेना चाहता हूँ कि ठीक था।
दिन 12
अब बात थोड़ी कम हो गई है।
कोई वजह नहीं है।
बस… कम हो गई है।
दिन 25
आज तुम्हारा मैसेज आया —
“Busy था/थी…”
पहले तुम “busy” नहीं होते थे,
अब मैं “important” नहीं रहा।
दिन 40
हमने आज सिर्फ “हाय-हेलो” किया।
बातें खत्म नहीं हुईं,
बस शुरू होना बंद हो गई हैं।
दिन 60
मैंने आज सोचा कि मैं ही बात कर लूँ।
फिर सोचा —
क्यों?
और फिर… नहीं की।
दिन 75
अब तुम्हारा नाम स्क्रीन पर आता है,
तो दिल नहीं धड़कता।
बस एक हल्की-सी पहचान होती है —
“हाँ, ये वही है…”
दिन 90
आज हमने पुरानी तस्वीरें देखीं।
हँसी भी आई।
लेकिन वो हँसी
अब हमारे बीच नहीं थी,
सिर्फ तस्वीरों में थी।
दिन 110
अब हम
एक-दूसरे की ज़िंदगी में
“ज़रूरी” नहीं
“वैकल्पिक” हो गए हैं।
दिन 130
कोई झगड़ा नहीं हुआ।
कोई कसम नहीं टूटी।
कोई वादा भी नहीं था शायद।
फिर भी
कुछ टूट गया है…
दिन 150
आज पूरा दिन निकल गया।
तुम्हारी याद नहीं आई।
और यही बात
सबसे ज़्यादा चुभी।
दिन 180
अब हम
अजनबी नहीं हैं,
लेकिन अपने भी नहीं रहे।
कुछ बीच में हैं…
जहाँ नाम है
पर रिश्ता नहीं।
दिन 200
अगर कोई पूछे
“क्या हुआ था?”
तो मैं क्या कहूँगा?
कुछ भी नहीं हुआ था…
बस
सब कुछ धीरे-धीरे
खत्म हो गया।
अंतिम पन्ना
रिश्ते
अचानक नहीं मरते
वे
हर दिन थोड़ा-थोड़ा
कम होते हैं…
जब तक
एक दिन
कुछ भी नहीं बचता।
मुकेश ,,,,,,,
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