होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Friday, 3 April 2026

रिश्तों का धीरे-धीरे खत्म होना

 रिश्तों का धीरे-धीरे खत्म होना


रिश्ते!

मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ

और जो कहना चाहता हूँ

उसे टूटने की आवाज़ में नहीं

धीरे-धीरे खत्म होती खामोशी में रख देना चाहता हूँ…


रिश्ते!

तुम अचानक नहीं टूटते

न कोई बड़ी वजह होती है

तुम

धीरे-धीरे खत्म होते हो…

जैसे दीये की लौ

बिना शोर किए

कम होती जाती है…


रिश्ते!

पहले

हर बात पर बात होती थी

हर बात ज़रूरी लगती थी

अब

ज़रूरी बातें भी

टाल दी जाती हैं…

रिश्ते!

पहले

फोन बजता था

तो दिल भी बज उठता था

अब

फोन बजता है

तो सोचते हैं 

“बाद में बात कर लेंगे…”


रिश्ते!

पहले

मिलने के बहाने ढूँढे जाते थे

अब

न मिलने के बहाने

अपने-आप मिल जाते हैं…

रिश्ते!

कोई झगड़ा नहीं होता

कोई बड़ा आरोप नहीं होता

बस

बातें कम हो जाती हैं

मुलाकातें कम हो जाती हैं

और फिर

एक दिन

सब कुछ कम हो जाता है…


रिश्ते!

तस्वीरें रह जाती हैं

मैसेज रह जाते हैं

कुछ यादें रह जाती हैं

लेकिन

वो एहसास

जो कभी ज़िंदा था

धीरे-धीरे

मर जाता है…


रिश्ते!

लोग कहते हैं

समय सब ठीक कर देता है

लेकिन सच तो यह है

समय

कई चीज़ें

चुपचाप खत्म भी कर देता है…


रिश्ते!

सब कुछ

वैसा ही दिखता है

जैसे पहले था

बस

अंदर से

कुछ नहीं बचा होता…


रिश्तों का धीरे-धीरे खत्म होना

यह कोई हादसा नहीं

यह एक प्रक्रिया है

जहाँ

कोई एक दिन नहीं

हर दिन थोड़ा-थोड़ा

खोता रहता है


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment