होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Friday, 3 April 2026

खुद से दूर होता हुआ आदमी

 खुद से दूर होता हुआ आदमी

आदमी!

मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ

और जो कहना चाहता हूँ

उसे आईने में नहीं

तुम्हारी आँखों के पीछे रख देना चाहता हूँ…


आदमी!

तुम बदल रहे हो

धीरे-धीरे

इतना धीरे

कि तुम्हें खुद भी पता नहीं चल रहा…


आदमी!

एक समय था

जब तुम

खुद के साथ रहते थे

खामोशी में भी

तुम्हें अपना साथ अच्छा लगता था

अब

तुम खुद से बचने लगे हो…


आदमी!

तुम भीड़ में जाते हो

लोगों से घिरते हो

हँसते हो

बातें करते हो

लेकिन जैसे ही

अकेले होते हो

घबराने लगते हो…


आदमी!

पहले तुम

आईने में खुद को देखते थे

अब

दूसरों की आँखों में

खुद को ढूँढते हो…


आदमी!

तुमने

अपने असली चेहरे पर

कई चेहरे चढ़ा लिए हैं

एक

दुनिया के लिए

एक

दोस्तों के लिए

एक

सोशल मीडिया के लिए…


और एक भी नहीं

अपने लिए…


आदमी!

तुमने

अपनी पसंद

दूसरों से पूछनी शुरू कर दी है

तुम्हें क्या अच्छा लगता है

यह भी अब

तुम्हारा नहीं रहा…


आदमी!

तुम दौड़ रहे हो

इतना दौड़ रहे हो

कि पीछे छूट गया है

वो “तुम”

जो कभी

शांत था

सच्चा था

साफ़ था…

आदमी!

तुम्हारे पास

सब कुछ है

सुविधाएँ

लोग

सफलता

लेकिन

एक चीज़ नहीं है

तुम खुद…


आदमी!

एक दिन

जब यह शोर थमेगा

और तुम

अकेले बैठोगे

तो शायद

तुम्हें याद आएगा

कि तुम कौन थे…


आदमी!

खुद से दूर जाना

सबसे आसान है

लेकिन

वापस आना

सबसे कठिन…


खुद से दूर होता हुआ आदमी

यह कहानी

किसी एक की नहीं है

यह हर उस इंसान की है

जो दुनिया को पाते-पाते

खुद को खो बैठा…


मुकेश ,,,,,,,

No comments:

Post a Comment