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Wednesday, 8 April 2026

मैं और इच्छाधारी नागिन

 मैं और इच्छाधारी नागिन


रात की देहरी पर

जब सन्नाटा उतरता है,

मैं अपने ही भीतर

एक अनजानी सरसराहट सुनता हूँ

जैसे कोई रहस्य

धीरे-धीरे साँस ले रहा हो।


वो आती है

अँधेरे की चादर ओढ़े,

आँखों में

सदियों का जादू लिए,

एक इच्छाधारी नागिन…

जो किसी कथा से निकलकर

मेरे वजूद में उतर आती है।


मैं डरता भी हूँ,

और खिंचता भी

उसकी फुँफकार में

कोई संगीत है,

उसकी ख़ामोशी में

कोई पुकार।


वो मेरे चारों ओर

लिपटती नहीं,

बस मुझे घेर लेती है

जैसे आईना

अपने अक्स को।


और फिर

वो मुझसे कुछ नहीं छीनती,

बल्कि

मुझमें छुपे ज़हर को

धीरे-धीरे जगा देती है।


मैं तिलमिलाता हूँ,

सच से,

अपने ही अँधेरों से,

उन इच्छाओं से

जिन्हें मैंने दबा रखा था।


वो मुस्कुराती है

जैसे जानती हो,

कि ये दर्द ही

मेरा जागना है।


मैं और वो

अब दो नहीं रहे,

वो मेरी रूह में

एक लहर बनकर बहती है,

और मैं…

उसकी आँखों में

अपना असली चेहरा देखता हूँ।


इच्छाधारी नागिन

कोई और नहीं,

वो मेरी ही परछाई है,

मेरी इच्छाओं का रूप,

मेरे सत्य का स्वरूप।


और अब

मैं उससे भागता नहीं,

मैं उसे अपनाता हूँ,

क्योंकि वही मुझे

मुझ तक ले जाती है…


मैं और इच्छाधारी नागिन

एक ही कहानी के

दो रूप हैं… 


मुकेश ,,,,,,,,,,

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