अँधेरे में चमकती नागमणि
रात की गहराई में,
जब अँधेरा
अपने सारे फन फैलाकर
दुनिया को लपेट लेता है,
उसी स्याह सन्नाटे में
कहीं एक हल्की-सी चमक जन्म लेती है।
कोई नहीं देखता उसे
न आँखें,
न आवाज़ें,
पर वो होती है…
अडिग, निर्विकार।
जैसे किसी नाग के मस्तक पर
चमकती हुई नागमणि,
जो अँधेरे से डरती नहीं,
बल्कि उसी के बीच
अपनी पहचान बनाती है।
अँधेरा उसे निगलना चाहता है,
हर तरफ़ से घेरता है,
फुँफकारता है,
ज़हर की परतें बिछाता है
पर वो चमक
कम नहीं होती।
मैंने उसे देखा है
अपने ही भीतर,
जब हर उम्मीद बुझती-सी लगी,
जब हर रास्ता
ख़ामोशी में गुम हो गया।
वहीं कहीं,
एक बिंदु-सा उजाला
धड़कता रहा,
जैसे कह रहा हो
“मैं हूँ,
और मेरा होना ही काफी है।”
वो नागमणि
न बाहर है,
न किसी कथा में,
वो मेरे भीतर है,
मेरी रूह की गहराई में।
जहाँ अँधेरा जितना बढ़ता है,
वो उतनी ही साफ़ चमकती है
जैसे सच,
जिसे छुपाया नहीं जा सकता।
और अब
मैं अँधेरे से डरता नहीं,
क्योंकि जान गया हूँ
हर फन के नीचे
एक नागमणि छुपी होती है…
बस उसे देखने की
नज़र चाहिए…
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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