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Wednesday, 8 April 2026

अँधेरे का नाग

 अँधेरे का नाग


रात होते ही

अँधेरा

अपने हज़ार फन उठाए

चुपचाप नहीं आता,

वो सरकता है,

और मेरे वजूद के इर्द-गिर्द

लिपट जाता है।


उसकी साँसों में

एक ठंडी फुँफकार है,

जो मेरे भीतर तक उतरती है,

और मैं चाहकर भी

खुद को बचा नहीं पाता।


मैं प्रतिरोध करता हूँ

कभी दुआओं से,

कभी ख़ामोशी से,

कभी अपने ही भीतर

एक दीया जलाकर।


पर अँधेरा

वो सुनता नहीं,

वो बस

अपना ज़हर उगलता है,

धीरे-धीरे,

मेरे ख़यालों में,

मेरी साँसों में।


और मैं…

हर रात

थोड़ा-थोड़ा बुझता हूँ,

थोड़ा-थोड़ा खोता हूँ,

जब तक कि

होश की आख़िरी डोर भी

ढीली न पड़ जाए।


फिर एक गहरी बेहोशी में

मैं गिर जाता हूँ

जहाँ न डर बचता है,

न दर्द,

बस एक अजीब-सी खामोशी।


पर अजीब बात ये है

हर सुबह

मैं फिर जागता हूँ,

जैसे उस ज़हर से भी

कोई रूह बची रह जाती है।


शायद

अँधेरा जितना भी

अपने फन फैलाए,

मेरे भीतर कहीं

एक उजाला है,

जो हर रात हारकर भी

मरता नहीं… 


मुकेश ,,,,,,,,,

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