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Wednesday, 8 April 2026

वक़्त का मुसाफ़िर नहीं, गवाह हूँ मैं

 वक़्त का मुसाफ़िर नहीं, गवाह हूँ मैं


मैं वक़्त का मुसाफ़िर नहीं,

गवाह हूँ मैं

लम्हों की भीड़ से अलग

किनारे बैठा हुआ एक साक्षी।


कभी दौड़ा था

घड़ियों के पीछे-पीछे,

हर पल को पकड़ने की चाह में

खुद को ही खोता रहा।


हर साल को

अपनी उम्र समझता रहा,

हर बदलती तस्वीर को

अपना सच मानता रहा।


फिर एक दिन

थककर बैठ गया भीतर,

और वहीं देखा

कि वक़्त तो बह रहा है,

पर मैं…

कहीं नहीं जा रहा।


ये जो दिन-रात हैं,

ये जो बदलते मौसम हैं,

ये सब मेरे सामने

आते हैं, जाते हैं

पर मैं वहीं ठहरा हूँ।


मैंने खुद को

एक आईने में नहीं,

एक ख़ामोशी में देखा है,

जहाँ कोई अक्स नहीं,

सिर्फ़ होना है।


अब मैं सफ़र में नहीं,

न मंज़िल की तलाश में,

मैं बस देख रहा हूँ

हर बीतते लम्हे को

बिना छुए, बिना थामे।


मैं वक़्त का हिस्सा नहीं,

वक़्त मेरी आँखों के सामने

एक कहानी है।


और मैं

उस कहानी का किरदार नहीं,

उसका गवाह हूँ…


मैं वक़्त का मुसाफ़िर नहीं,

गवाह हूँ मैं…


मुकेश ,,,,,,,,

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