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Wednesday, 8 April 2026

जिस्म की दीवार, रूह का दरवाज़ा

 जिस्म की दीवार, रूह का दरवाज़ा


यह जिस्म

एक दीवार है,

मिट्टी की, वक़्त की,

जिस पर हर दिन

कुछ निशान उभर आते हैं।


कभी थकान,

कभी झुर्रियाँ,

कभी ख़ामोशियों की परतें

सब इसी पर लिखी जाती हैं।


पर इसके भीतर कहीं

एक दरवाज़ा भी है

रूह का,

जो दिखाई नहीं देता,

पर खुलता है…

जब इंसान खुद से मिलता है।


मैंने भी बरसों

इस दीवार को ही “मैं” समझा,

इसी को सजाया,

इसी पर रोया,

इसी में खोया रहा।


फिर एक दिन

ख़ामोशी ने दस्तक दी,

और उस दरवाज़े की आहट आई,

जो हमेशा से यहीं था।


जब वो खुला

तो न वक़्त रहा,

न उम्र का बोझ,

बस एक सुकून था,

जो कहीं बाहर नहीं,

मेरे भीतर था।


अब मैं जानता हूँ

यह जिस्म सिर्फ़ एक दीवार है,

जिसके पार

मेरा असली घर है।


और मैं…

अब उसी दरवाज़े के पास बैठा हूँ,

जहाँ से हर साँस

रूह की ओर जाती है…


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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