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Friday, 3 April 2026

अकेलापन! मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ

 अकेलापन!

मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ

और जो कहना चाहता हूँ

उसे भीड़ में नहीं

तन्हा कमरों की दीवारों पर लिख देना चाहता हूँ…


अकेलापन!


लोग कहते हैं

तुम बुरी चीज़ हो

तुम आदमी को खा जाते हो


लेकिन सच कहूँ

तो कई बार

तुम ही सबसे सच्चे लगते हो…


अकेलापन!


जब सब साथ होते हैं

तब भी तुम आ जाते हो

धीरे से

बिना दरवाज़ा खटखटाए


और मैं

हँसते हुए चेहरों के बीच

अचानक

चुप हो जाता हूँ…


अकेलापन!


पहले मैं तुमसे भागता था

दोस्तों में

शराब में

बातों में

शोर में


लेकिन तुम

हर जगह पहुँच जाते थे

जैसे मेरा पीछा करते हो…


अकेलापन!


अब मैंने

तुमसे भागना छोड़ दिया है

अब तुमसे बात करता हूँ

जैसे किसी पुराने दोस्त से


तुम सुनते हो

बिना टोके

बिना जज किए

बिना सलाह दिए…


अकेलापन!


तुमने ही सिखाया

कि खुद के साथ बैठना क्या होता है

खामोशी को सुनना क्या होता है

और अपने भीतर

कितना कुछ भरा होता है…


अकेलापन!


लेकिन कभी-कभी

तुम भारी हो जाते हो

इतने भारी

कि साँस लेना मुश्किल हो जाता है


तब मन करता है

कोई हो

जो बस कह दे —

“मैं हूँ…”


अकेलापन!


फोन भरा रहता है

नोटिफिकेशन आते रहते हैं

लोग ऑनलाइन दिखते हैं


फिर भी

दिल ऑफलाइन रहता है

और तुम

फुल नेटवर्क के साथ

मेरे पास बैठे रहते हो…


अकेलापन!


तुम बुरे नहीं हो

बस

तुम्हारी आदत नहीं है हमें


हम डरते हैं

खुद से मिलने से

इसलिए तुम्हें

नाम दे देते हैं — “अकेलापन”…


अकेलापन!


एक दिन

शायद मैं इतना मजबूत हो जाऊँ

कि तुम्हारे साथ भी

मुस्कुरा सकूँ


और कह सकूँ —

“चलो, आज फिर

थोड़ा-सा खुद को जीते हैं…”


मुकेश ,,,,,,,,,

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