पिता की चुप्पी
पिता!
मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ
लेकिन आपकी चुप्पी
हर बार
मेरे शब्दों से पहले
आकर खड़ी हो जाती है…
पिता!
आप बहुत कम बोलते हैं
इतना कम
कि कई बार लगता है
जैसे आप कुछ छुपा रहे हैं
लेकिन अब समझ आता है
आप कुछ छुपाते नहीं
आप बहुत कुछ सहते हैं…
पिता!
जब घर में शोर होता था
आप चुप रहते थे
जब सब अपनी-अपनी बात कह रहे होते थे
आप बस सुनते रहते थे
तब लगता था
आपको कोई फर्क नहीं पड़ता
अब समझ आया
सबसे ज़्यादा फर्क
आपको ही पड़ता था…
पिता!
आपने कभी नहीं बताया
कि थक जाते हैं आप
कि डरते भी हैं कभी-कभी
कि रोने का मन भी करता है
आपने बस
अपने हिस्से का आसमान
अंदर ही अंदर
समेट कर रख लिया…
पिता!
आपकी चुप्पी में
कितनी आवाज़ें हैं
अधूरी इच्छाओं की
टूटे हुए सपनों की
दबी हुई तकलीफों की
लेकिन बाहर से
वो बस एक साधारण
“ठीक हूँ” बनकर रह जाती है…
पिता!
जब मैंने गलती की
आप चिल्लाए नहीं
बस चुप हो गए
और आपकी वो चुप्पी
मेरी सबसे बड़ी सज़ा बन गई…
पिता!
आपकी चुप्पी
कभी दीवार लगती है
कभी छाँव
कभी दूरी बना देती है
कभी संभाल लेती है
मैं आज तक नहीं समझ पाया
कि आपकी चुप्पी
मुझसे दूर है
या मेरे सबसे पास…
पिता!
अब जब मैं बड़ा हो रहा हूँ
तो खुद को
थोड़ा-थोड़ा
आप जैसा पाता हूँ
बातें कम हो गई हैं
चुप्पियाँ बढ़ गई हैं
और डर लगता है
कि कहीं मैं भी
आपकी तरह
सब कुछ भीतर ही न रख लूँ…
पिता!
एक दिन
अगर आपकी चुप्पी
हमेशा के लिए चली गई
तो शायद
मैं सबसे ज़्यादा
उसी को मिस करूँगा
जिसे मैं कभी समझ नहीं पाया…
पिता!
आप बोलते नहीं
लेकिन आपकी चुप्पी
हर रोज़ मुझसे कहती है —
“मैं हूँ…”
और शायद
कभी-कभी
“मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ…”
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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