बूढ़ा होता हुआ पिता
पिता!
मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ
लेकिन डरता हूँ
कि कहीं आप हँस न दें
या फिर हमेशा की तरह
चुप न हो जाएँ…
पिता!
धीरे-धीरे
आप बूढ़े हो रहे हैं
जैसे दीवार पर टंगी घड़ी
अब भी चल तो रही है
लेकिन उसकी टिक-टिक में
पहले जैसा भरोसा नहीं रहा…
पिता!
आपके बाल
जो कभी काले थे
अब सफ़ेद नहीं
बल्कि कुछ-कुछ गायब हो रहे हैं
और मैं
हर बार बाल कटवाते हुए सोचता हूँ
कि उम्र
कितनी चुपचाप अपना काम करती है!
पिता!
आपकी चाल
जो कभी तेज़ थी
अब ठहर-ठहर कर चलती है
सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त
आप दीवार पकड़ लेते हैं
और मैं
दूसरी तरफ़ देखकर
अपनी आँखें छुपा लेता हूँ…
पिता!
आप अब कम बोलते हैं
जैसे शब्द भी
आपके साथ थक गए हों
पहले आप समझाते थे
अब बस देखते हैं
और मैं समझ जाता हूँ
कि चुप्पी भी
एक तरह की सीख होती है!
पिता!
आपके हाथ
जो कभी मज़बूत थे
अब हल्के-हल्के काँपते हैं
उन्हीं हाथों से
आपने मेरा हाथ थामा था
जब मैं चलना सीख रहा था
और अब
मन करता है
कि मैं आपका हाथ पकड़ लूँ…
पिता!
आप अब
बार-बार एक ही बात पूछते हैं
एक ही किस्सा सुनाते हैं
और मैं
पहले चिढ़ जाता था
अब मुस्कुरा कर सुनता हूँ
जैसे पहली बार सुन रहा हूँ…
पिता!
आपके चश्मे का नंबर
हर साल बढ़ जाता है
लेकिन मुझे लगता है
आपकी नज़र
अब भी उतनी ही साफ़ है
क्योंकि आप
आज भी मुझे
मेरे भीतर तक देख लेते हैं!
पिता!
डर लगता है
कि एक दिन
आपकी वो कुर्सी खाली रह जाएगी
जहाँ आप हर शाम बैठते हैं
और घर में
सब कुछ होते हुए भी
कुछ बहुत ज़रूरी
ग़ायब हो जाएगा…
पिता!
लोग कहते हैं
समय सब सिखा देता है
लेकिन समय
एक चीज़ कभी नहीं सिखाता —
पिता के बिना जीना…
पिता!
अगर कभी
मैं कुछ कह न पाऊँ
तो समझ लीजिएगा
कि मैं आपसे
बहुत प्यार करता हूँ
बस
आपकी तरह
कह नहीं पाता…
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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