तुम्हारी एक नज़र की शिफ़ा
तुम्हारी एक नज़र की शिफ़ा ऐसी है,
कि दिल का हर ज़ख़्म ख़ामोशी से भर जाता है,
बिना किसी आवाज़ के,
बिना किसी दवा के।
तुम जब देखते हो
तो यूँ लगता है
जैसे रूह पर कोई नर्म-सा उजाला उतर आया हो,
और अंदर की सारी वीरानी
आहिस्ता-आहिस्ता महकने लगी हो।
ये कैसी नज़र है तुम्हारी—
न इसमें कोई सवाल,
न कोई इल्तिज़ा,
बस एक सुकून है
जो सीधे दिल तक पहुँच जाता है।
मैंने बहुत तलाशा है इलाज,
हर दर, हर शख़्स, हर दुआ में
मगर जो राहत तुम्हारी आँखों में मिली,
वो कहीं और नहीं थी।
तुम्हारी निगाहों में
जैसे कोई राज़ छुपा है—
जो कहता नहीं,
मगर सब कुछ समझा देता है।
जब तुम सामने होते हो,
तो दिल को समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती,
वो खुद-ब-खुद
सुकून की तरफ़ झुक जाता है।
तुम्हारी एक नज़र
बस एक नज़र…
और सारे सवाल ख़त्म हो जाते हैं,
जैसे कोई लंबी रात
सुबह में बदल गई हो।
कभी सोचा नहीं था
कि इलाज इतना आसान होगा
कि बस तुम देखो,
और मैं ठीक हो जाऊँ।
शायद इसी को कहते हैं
मोहब्बत की शिफ़ा,
जो दवा नहीं,
एक एहसास बनकर
दिल में उतरती है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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