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Wednesday, 1 April 2026

जाड़े की रातों में अलाव तापते हुए — घर भर के साथ ‘हवामहल’ सुनना

 जाड़े की रातों में अलाव तापते हुए — घर भर के साथ ‘हवामहल’ सुनना


1.

जाड़े की रात थी,

आँगन में अलाव जलता था

और हम

गोल घेरा बनाकर बैठते थे—

बीच में आग,

और किनारों पर

हमारी साँसें भाप बनती हुई।


2.

रेडियो की आवाज़

थोड़ी खड़खड़ाती थी

पर

‘हवामहल’ शुरू होते ही

पूरा घर

किसी और दुनिया में चला जाता था।


3.

मैं

दादी के पास बैठा रहता था

और

उनकी उँगलियों की गर्मी में

कहानी के डर भी

धीमे पड़ जाते थे।


4.

हर किरदार

रेडियो से निकलकर

हमारे बीच बैठ जाता था

और

हम

बिना देखे

सब कुछ देख लेते थे।


5.

बीच-बीच में

कोई लकड़ी खिसकाता,

कोई राख कुरेदता

और

कहानी

फिर से जल उठती थी।


6.

अब

अलाव कम जलते हैं,

रेडियो भी चुप है

और

घर के लोग

अपने-अपने कमरों में

अलग-अलग कहानियाँ सुनते हैं।


7.

कभी-कभी

ठंडी रात में

मन करता है

फिर से वही सब हो—

एक अलाव,

एक रेडियो,

और

पूरा घर

एक ही कहानी में सिमटा हुआ।


मुकेश ,,,,,,,,

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