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Wednesday, 1 April 2026

स्कूल के बाद की वो आधी धूप

 स्कूल के बाद की वो आधी धूप

(एक पुरुष की तरफ़ से — सात छोटी कविताएँ)


1.

स्कूल छूटते ही

जो आधी धूप गिरती थी गली में

वहीं

कुछ लड़कियाँ

अपनी चोटी खोलकर

हँसी पहन लेती थीं—

मैं

बस दूर खड़ा

देखता रह जाता था।


2.

उनके बस्ते

हल्के हो जाते थे

घर पहुँचने से पहले

जैसे

किताबें नहीं,

दिन भर की बंदिशें

उतार फेंकी हों उन्होंने।


3.

मैंने

कभी उनसे बात नहीं की

पर

उनकी हँसी

मुझे नाम से पुकारती थी

और मैं

हर बार अनसुना कर देता था।


4.

आधी धूप में

उनके साये

लम्बे हो जाते थे

और

मैं सोचता था

क्या उनके सपने भी

इतने ही लम्बे होंगे?


5.

एक लड़की थी

जो चलते-चलते

बार-बार पीछे देखती थी

शायद

किसी को ढूँढ रही थी

या

खुद को छोड़ आई थी कहीं।


6.

अब

वो गली तो है,

पर

वो आधी धूप नहीं

शायद

इमारतों ने

उसे बाँट लिया है।


7.

कभी-कभी

शाम के वक़्त

मैं उसी रास्ते से गुज़रता हूँ

और मन में पूछता हूँ

क्या

वो लड़कियाँ

अब भी

किसी धूप में

आधी ही हँसती होंगी?


मुकेश ,,,,,,

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