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Wednesday, 1 April 2026

सहेलियों की दुनिया, जहाँ कोई जजमेंट नहीं था

 सहेलियों की दुनिया, जहाँ कोई जजमेंट नहीं था

(एक पुरुष की नज़र से)


1.

वे

एक साथ बैठती थीं—

जमीन पर,

चौखट पर,

सीढ़ियों पर

और

दुनिया को

अपने घेरे से बाहर रख देती थीं।


2.

मैं

थोड़ी दूरी पर रहता था

जैसे

उस दुनिया में

मेरी इजाज़त नहीं थी

और सच कहूँ,

शायद

ज़रूरत भी नहीं।


3.

उनकी हँसी

बिना वजह होती थी—

और

उसी में

सारे जवाब छुपे होते थे

बिना किसी सवाल के।


4.

कोई किसी को

टोकता नहीं था

ना कपड़ों पर,

ना शक्ल पर,

ना सपनों पर

बस

होने दिया जाता था।


5.

एक लड़की

अपनी बात अधूरी छोड़ देती

दूसरी

उसे पूरा कर देती—

जैसे

उनके बीच

शब्द नहीं,

समझ बहती थी।


6.

मैंने

कई बार देखा

वे

एक-दूसरे की

कमज़ोरियाँ जानती थीं

पर

उन्हें हथियार नहीं बनाती थीं।


7.

उनके बीच

ना कोई जज था,

ना कोई अदालत

बस

कुछ दिल थे

जो एक-दूसरे को

बरी कर देते थे।


8.

आज

वो लड़कियाँ

औरतें हो गई होंगी

शायद

अब

उन्हें भी

जज किया जाता होगा।


9.

उनकी वो दुनिया

बहुत छोटी थी—

पर

उसमें

किसी को

छोटा नहीं किया जाता था।


10.

मैंने

कभी हिस्सा नहीं लिया

पर

आज समझता हूँ

वो

सबसे सुरक्षित जगह थी

इस दुनिया की।


11.

काश

हम मर्द भी

सीख पाते—

बिना जज किए

सिर्फ़ साथ होना—


तो

शायद

हमारी दुनिया भी

थोड़ी कम कठोर होती।


मुकेश ,,,,,

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