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Wednesday, 1 April 2026

कूदती रस्सी और अटकी हुई साँसें

 कूदती रस्सी और अटकी हुई साँसें

(एक आदमी की यादों से)


1.

अब

कहीं नहीं दिखतीं

दो चोटी वाली लड़कियाँ

जो

आँगन में

रस्सी की टप-टप पर

दुनिया भुला देती थीं।


2.

मैं खड़ा रहता था

थोड़ा दूर

और देखता था

उनकी गिनती

“एक… दो… तीन…”

जैसे

वक़्त भी

उनके साथ कूद रहा हो।


3.

एक लड़की थी

जो हर बार

हँसते-हँसते

रस्सी में उलझ जाती थी

आज

वही

ज़िन्दगी में

कहीं उलझ गई होगी।


4.

अब

ना वो आँगन है,

ना वो रस्सी,

ना वो हँसी

बस

यादों की धूल में

कुछ आवाज़ें पड़ी हैं।


5.

कूदने से पहले

वे

एक-दूसरे को देखती थीं

जैसे पूछ रही हों

“तैयार?”

और फिर

बिना जवाब के

उड़ जाती थीं।


6.

मैंने

कई बार सोचा

उनसे कहूँ

मुझे भी सिखा दो

पर

लड़के

उस खेल में

शामिल नहीं होते थे।


7.

अब

लड़कियाँ दिखती हैं

मोबाइल में झुकी हुई,

रील्स में कूदती हुई

पर

वो असली साँसें

अब कहीं अटक गई हैं।


8.

हर बार

जब रस्सी ज़मीन से टकराती थी

एक लय बनती थी

अब

शहर में

बस शोर है,

कोई लय नहीं।


9.

ज़िन्दगी

शायद वही रस्सी थी

जो

हम सबके बीच

घूम रही थी

हमने ही

उसे छोड़ दिया।


10.

ऐसा नहीं है

कि लड़कियाँ अब नहीं हँसतीं

पर

वैसी बेफ़िक्र हँसी

अब

किसी को नहीं आती।


11.

कभी-कभी

मन करता है

एक रस्सी खरीद लाऊँ

और

किसी गली में खड़ा होकर पूछूँ—

“कोई है

जो कूदना जानता हो?”


पर

डर लगता है

कहीं

कोई जवाब ना दे।


मुकेश ,,,,

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