नाम–रूप–क्रियात्मक जगत् में ब्रह्म की व्यापकता — आकाशवत् अद्वैत स्वरूप
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
अस्य सर्वस्य जगतः नाम-रूप-क्रियात्मकस्य तद् उ अपि बहिः च।
व्यापकत्वात् आकाशवत्।
यह सम्पूर्ण जगत्, जो नाम, रूप और क्रियाओं से युक्त है—उसके भीतर भी ब्रह्म है और बाहर भी।
क्योंकि वह आकाश के समान सर्वव्यापक है।
यह भाष्यांश अद्वैत वेदान्त के उस गूढ़ सिद्धांत को स्पष्ट करता है, जिसमें ब्रह्म की सर्वव्यापकता (all-pervasiveness) को नाम, रूप और क्रिया से युक्त जगत् के संदर्भ में समझाया गया है।
“अस्य सर्वस्य जगतः”—यहाँ सम्पूर्ण जगत् का उल्लेख है, जो नाम (नामकरण), रूप (आकार), और क्रिया (गतिविधि) से बना हुआ है। यही वह संसार है, जिसे हम प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करते हैं—विविध वस्तुएँ, प्राणी, घटनाएँ, और परिवर्तन।
शंकराचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि यह समस्त जगत्, चाहे वह कितना ही विविध और परिवर्तनशील क्यों न हो, उसका आधार और अधिष्ठान ब्रह्म ही है।
अब महत्वपूर्ण वाक्य है—“तद् उ अपि बहिः च”
अर्थात् ब्रह्म इस जगत् के भीतर भी है और बाहर भी।
यह कथन साधारण प्रतीत हो सकता है, परंतु इसमें गहन दार्शनिक अर्थ निहित है—
यदि ब्रह्म केवल “भीतर” होता, तो वह सीमित हो जाता।
यदि केवल “बाहर” होता, तो भी वह पूर्ण नहीं होता।
परंतु जब कहा जाता है कि वह भीतर और बाहर दोनों है, तब यह उसकी अनंतता (infinity) और अद्वैतता को प्रकट करता है।
यहाँ “आकाशवत्” दृष्टांत अत्यंत उपयुक्त है।
आकाश सभी वस्तुओं के भीतर भी है और बाहर भी।
घड़े के भीतर का आकाश और बाहर का आकाश अलग नहीं होते—विभाजन केवल घड़े की उपाधि के कारण प्रतीत होता है।
इसी प्रकार, शरीर, मन, और जगत् की विविध वस्तुएँ केवल उपाधियाँ (limiting adjuncts) हैं, जो ब्रह्म को सीमित करती हुई प्रतीत होती हैं।
परंतु वास्तव में ब्रह्म इन सभी उपाधियों से परे, एक ही, अखंड और सर्वव्यापक है।
यहाँ “नाम-रूप-क्रियात्मक” शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है।
यह दर्शाता है कि संसार का समस्त अनुभव केवल नाम (label), रूप (appearance), और क्रिया (function) पर आधारित है।
परंतु इन सबका आधार जो है—वह चैतन्य, वह ब्रह्म—वह स्वयं इनसे परे है।
शंकराचार्य का अभिप्राय यह है कि
जगत् की विविधता वास्तविक नहीं, बल्कि ब्रह्म की एकता पर आरोपित (superimposed) है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है—
मिट्टी से बने विभिन्न पात्र—घड़ा, कटोरा, मूर्ति—नाम और रूप में भिन्न हैं, परंतु उनका सार तत्व एक ही है—मिट्टी।
इसी प्रकार, यह सम्पूर्ण जगत् नाम और रूप में भिन्न दिखाई देता है, परंतु उसका वास्तविक स्वरूप एक ही ब्रह्म है।
इस भाष्यांश में यह प्रतिपादित किया गया है कि नाम, रूप और क्रिया से युक्त सम्पूर्ण जगत् में ब्रह्म भीतर और बाहर दोनों रूपों में विद्यमान है। उसकी सर्वव्यापकता को आकाश के दृष्टांत से स्पष्ट किया गया है। इस प्रकार, अद्वैत वेदान्त के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, और जगत् उसकी उपाधियों के कारण विविध रूप में प्रतीत होता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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