दूर–समीपातीत ब्रह्म — सर्वान्तरात्मा का अद्वैत प्रतिपादन
मूल पदांश (संशोधित रूप में)
न केवलं दूरेऽन्तिके च; तद् अन्तः—अभ्यन्तरे अस्य सर्वस्य।
“य आत्मा सर्वान्तरः” इति श्रुतेः।
वह (ब्रह्म) केवल दूर और निकट ही नहीं है, बल्कि इस सम्पूर्ण जगत् के भीतर—सबके अंतर में स्थित है।
क्योंकि श्रुति कहती है—“वह आत्मा सबके भीतर रहने वाला है।”
यह भाष्यांश ब्रह्म के स्वरूप को और अधिक गहनता से उद्घाटित करता है। पहले यह बताया गया कि ब्रह्म “दूर” भी है और “समीप” भी। अब शंकराचार्य इस विचार को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि ब्रह्म केवल दूर और पास का विषय नहीं, बल्कि वह सर्वान्तरात्मा है—सभी के भीतर स्थित।
“न केवलं दूरेऽन्तिके च”—अर्थात् ब्रह्म को केवल दूरी और निकटता की श्रेणियों में बाँधना पर्याप्त नहीं है। ये दोनों ही सापेक्ष (relative) अवधारणाएँ हैं, जो स्थान और दृष्टिकोण पर आधारित हैं। परंतु ब्रह्म इन सबसे परे है।
“तदन्तः—अभ्यन्तरे अस्य सर्वस्य”—यहाँ यह प्रतिपादित किया गया है कि ब्रह्म प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक जीव, प्रत्येक अनुभव के भीतर स्थित है।
यह “भीतर होना” भी भौतिक अर्थ में नहीं है, जैसे कोई वस्तु किसी पात्र के भीतर हो।
यह “भीतर” होना है—अधिष्ठान रूप में, चैतन्य रूप में।
श्रुति का वचन—“य आत्मा सर्वान्तरः”—इस सत्य की पुष्टि करता है।
अर्थात् वह आत्मा जो सबके भीतर है, जो सबका अंतरतम है—वही ब्रह्म है।
यहाँ “सर्वान्तर” का अर्थ है
जो शरीर के भीतर है
जो मन के भीतर है
जो बुद्धि के भीतर है
और जो इन सबका भी साक्षी है
अर्थात् वह सबसे सूक्ष्म स्तर पर स्थित है—जहाँ कोई अन्य पहुँच नहीं सकता।
शंकराचार्य का अभिप्राय है कि
ब्रह्म न केवल सर्वव्यापक है (हर जगह है), बल्कि सर्वान्तर भी है (हर वस्तु के भीतर है)।
यहाँ एक सूक्ष्म बिंदु समझना आवश्यक है
यदि ब्रह्म केवल “बाहर” होता, तो वह सीमित होता।
यदि केवल “भीतर” होता, तो भी सीमित होता।
परंतु जब वह भीतर और बाहर दोनों है, तब वह वास्तव में असीम (infinite) सिद्ध होता है।
एक दृष्टांत से इसे समझा जा सकता है
मिट्टी से बने घड़े के भीतर भी आकाश है और बाहर भी आकाश है।
घड़ा केवल एक उपाधि है, जो आकाश को सीमित करता हुआ प्रतीत होता है, परंतु वास्तव में आकाश न भीतर सीमित है, न बाहर—वह सर्वत्र है।
इसी प्रकार, शरीर और मन उपाधियाँ हैं, जो आत्मा को सीमित करती हुई प्रतीत होती हैं।
परंतु आत्मा वास्तव में न केवल उनके भीतर है, बल्कि उनसे परे भी है।
इस प्रकार, ब्रह्म को “दूर”, “समीप”, और “अन्तः”—इन तीनों रूपों में वर्णित करना केवल साधक को धीरे-धीरे उस सत्य की ओर ले जाने का उपाय है, जो अंततः सभी सीमाओं से परे है।
इस भाष्यांश में यह स्पष्ट किया गया है कि ब्रह्म केवल दूर या निकट ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जगत् के भीतर स्थित सर्वान्तरात्मा है। श्रुति के प्रमाण से यह सिद्ध होता है कि आत्मा प्रत्येक जीव के अंतरतम में विद्यमान है। इस प्रकार, ब्रह्म की वास्तविकता सभी सीमाओं से परे, सर्वव्यापक और सर्वान्तर है—जिसका साक्षात्कार ही अद्वैत ज्ञान है।
मुकेश। .........
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