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Monday, 27 April 2026

विघटन

 विघटन


सब कुछ जस का तस था

नाम वही,

आवाज़ वही,

चलने का ढंग भी वही…


फिर भी

कुछ था

जो अब जुड़ा हुआ नहीं था…


जैसे भीतर

किसी ने

धीरे-धीरे

सारे जोड़ खोल दिए हों


बिना आवाज़,

बिना घोषणा…


मैं बोलता था

पर शब्द

मुझसे नहीं निकलते थे…


वे आते थे,

ठहरते थे,

और गुजर जाते थे


जैसे मैं

सिर्फ़ एक रास्ता हूँ…


मैं चलता था

पर कदमों में

कोई “इरादा” नहीं था…


वे बस

होते जा रहे थे…


पहले

हर चीज़ का एक कारण था

हर भावना की एक कहानी…


अब

कहानी टूट गई थी…


भावनाएँ आती थीं,

पर टिकती नहीं


ग़ुस्सा

आकर चला जाता,

ख़ुशी

छूकर निकल जाती…


और मैं

उनके बीच

कहीं नहीं था…


यही विघटन था


जहाँ

तुम टूटते नहीं,

बल्कि

तुम्हारे “जुड़े होने का भ्रम”

टूट जाता है…


मैंने देखा


जिसे मैं “मैं” कहता था,

वो दरअसल

कई परतों का जोड़ था


यादें,

डर,

इच्छाएँ,

आदतें…


और अब

ये सब

अपनी-अपनी दिशा में

बिखरने लगे थे…


कोई केंद्र नहीं बचा था

जो इन्हें बाँध सके…


मैंने

खुद को समेटने की कोशिश की


नाम पुकारा,

पुरानी यादें दोहराईं,

खुद को समझाया


“तू यही है…”


मगर

आवाज़ खोखली थी…


क्योंकि

जिसे पुकार रहा था

वो अब

किसी एक जगह था ही नहीं…


मैं

अपने ही भीतर

ढहता नहीं था


मैं

धीरे-धीरे

खुल रहा था…


जैसे

कसकर बंधी हुई मुट्ठी

अचानक ढीली पड़ जाए…


और उसमें जो कुछ था

वो

अपनी-अपनी दिशा में

सरकने लगे…


डर

अब भी आता था


मगर

वो टिकता नहीं…


क्योंकि

डर को भी

एक “मैं” चाहिए होता है…


और यहाँ

वो भी

विघटित हो रहा था…


अब

कुछ भी स्थिर नहीं था


न पहचान,

न इरादा,

न कहानी…


और अजीब बात

यही अस्थिरता

पहली बार

सच्ची लग रही थी…


क्योंकि

जो स्थिर था,

वो बना हुआ था…


और जो टूट रहा था

वो असली था…


अब सवाल नहीं था

“मैं कौन हूँ?”


सवाल था

“क्या मैं

कभी था भी…?”


और इस सवाल के साथ

कुछ और भी

धीरे-धीरे

घुलने लगा…


शेर:


जोड़ जो था—वो ही धीरे-धीरे खुलने लगा,

मैं बिखरा नहीं—बस “मैं” का भ्रम घुलने लगा।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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