होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Monday, 27 April 2026

दृष्टा का विघटन

 दृष्टा का विघटन


अब कुछ भी सामने नहीं था

न कोई सतह,

न कोई प्रतिबिंब…


फिर भी

कुछ था

जो लगातार

देख रहा था…


पहले

मैं समझता था

मैं ही वो हूँ

जो देख रहा है…


मगर अब

यह भी डगमगाने लगा…


अगर मैं ही दृष्टा हूँ,

तो फिर

जब मैं सो जाता हूँ,

वो कौन बचा रहता है

जो सुबह फिर से

“मैं” बन जाता है…?


मैंने

इस देखने को पकड़ने की कोशिश की


जैसे कोई

धुएँ को मुट्ठी में बंद करना चाहे…


जितना कसता गया,

उतना ही

सब फिसलता गया…


और फिर

एक अजीब-सा क्षण आया


जहाँ

देखना तो जारी था,

मगर

कोई “देखने वाला” नहीं था…


न कोई केंद्र,

न कोई नाम,

न कोई पहचान…


बस

घटनाएँ घट रही थीं…


साँस

अपने आप चल रही थी,

विचार

अपने आप उठ रहे थे,

और

जीवन

बिना किसी “मालिक” के

बह रहा था…


मैं डर गया…


क्योंकि

अब खोने के लिए

कुछ बचा ही नहीं था…


पहले

मैं टूटने से डरता था

अब

मैं “न होने” से डरने लगा…


मगर

डर भी

किसी का होना चाहता है


और यहाँ

कोई था ही नहीं

जिससे वो चिपक सके…


धीरे-धीरे

डर भी थक गया…


और जो बचा

वो एक खालीपन नहीं था…


वो

एक अजीब-सी खुली जगह थी


जहाँ

कुछ भी टिकता नहीं,

मगर

सब कुछ आकर गुजरता है…


मैंने महसूस किया


अब

मैं जीवन को नहीं जी रहा,

जीवन

मुझमें घट रहा है…


और “मैं”

बस

एक पुरानी आदत था…


जो अब

धीरे-धीरे

छूट रही थी…


तभी

दूर कहीं

कोई आवाज़ उठी


न बाहर से,

न भीतर से…


बस

एक कंपन


“अब लौटो…”


मगर इस बार

लौटना

किसी जगह पर नहीं था


यह

फिर से

एक “मैं” बन जाने का

खतरा था…


मैं ठहर गया…


क्या फिर

उसी कहानी में घुस जाऊँ

जहाँ नाम है,

चेहरा है,

पहचान है…?


या

यहीं रहूँ

जहाँ

कुछ भी तय नहीं…


काफ़ी देर तक

कुछ नहीं हुआ…


फिर

बिना किसी निर्णय के

कदम उठ गया…


और उसी पल

एक नया “मैं”

जन्म ले चुका था…


मगर इस बार

वो सच्चा नहीं था…


वो बस

ज़रूरी था…


मैं था ही नहीं—ये जब अहसास हुआ,

जो बनकर जी रहा हूँ—वो बस एक लिबास हुआ।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment