सतहें भी आईना होती हैं
कोई ज़रूरी नहीं
आईना काँच का ही बना हो
कोई भी
बेहद चिकनी, साफ़ सतह
आईना बन जाती है…
ये और बात है
कि उसमें सूरत
उतनी साफ़ नहीं दिखती…
कभी
पानी की सतह पर झुको
चेहरा लहरों में टूटता है…
कभी
किसी की आँखों में देखो
वहाँ तुम
वैसे नहीं दिखते
जैसे खुद को समझते हो…
कभी
खामोशी भी आईना होती है
जहाँ
तुम्हारी हर आवाज़
तुम्हारे ही भीतर
गूँजकर लौटती है…
मैंने जाना
आईना
माध्यम नहीं,
मौक़ा है…
जहाँ तुम
अपने होने से टकराते हो…
काँच
बस एक बहाना है
असल में
हर साफ़ सतह
तुम्हें तुम्हारे पास
वापस भेजती है…
मगर
हर सतह का सच
एक-सा नहीं होता
कहीं
तुम्हारा चेहरा फैल जाता है,
कहीं
सिकुड़ जाता है,
कहीं
टूटकर बिखर जाता है…
और कहीं
तुम
दिखते ही नहीं…
तब समझ आता है
सूरत
सतह पर नहीं,
नज़र में रहती है…
अगर नज़र साफ़ नहीं
तो
सबसे पारदर्शी आईना भी
धुंधला लगेगा…
और अगर नज़र
थोड़ी सच्ची हो जाए
तो
टूटी हुई सतह भी
तुम्हें
तुम्हारा सच लौटा देगी…
अब
मैं आईनों को नहीं ढूँढता
मैं सतहों को पढ़ता हूँ…
पानी,
आँखें,
खामोशियाँ,
रिश्ते…
हर जगह
मैं थोड़ा-थोड़ा
उभरता हूँ
पूरी तरह कभी नहीं…
शायद
पूरा दिखना
ज़रूरी भी नहीं…
क्योंकि
जो पूरा दिख जाए
वो शायद
जितना है
उससे कम ही हो…
हर सतह पे चेहरा मेरा साफ़ नहीं आता,
नज़र अगर सच्ची हो—तो आईना खुद बन जाता।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment