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Saturday, 4 April 2026

समझदार होने की ट्रेनिंग

 समझदार होने की ट्रेनिंग


सही बात है भाईसाहब,

कि लोगों को “सोचना” नहीं आता,

उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता

कि वे किस बात पर यक़ीन कर लेंगे

और किस पर हँस देंगे।


उनका भरोसा नहीं किया जा सकता

कि सच सामने रख दो

तो वे उसे झूठ कह देंगे,

और झूठ को

सजाकर परोस दो

तो उसे सच मान बैठेंगे।


दरअसल लोगों पर भरोसा किया ही नहीं जा सकता—

वे सुनते कुछ हैं,

समझते कुछ हैं,

और आगे बढ़ाते कुछ और ही हैं।


सभ्यता की शुरुआत से ही

थोड़े उलझे हुए हैं लोग—

उन्हें समझ नहीं आता:

कि सवाल करें या सिर हिलाएँ,

कि पढ़ें या सिर्फ़ फॉरवर्ड कर दें,

कि सोचें… या सिर्फ़ मान लें।


पिछले कुछ बरसों में तो

माथा और घूम गया है—

अब कहते हैं:

“हम खुद सोचेंगे!”

“हम सवाल पूछेंगे!”

“हम हर बात का कारण जानेंगे!”


कोई-कोई तो इतने ज़िद्दी होते हैं

कि किताबें पढ़ लेते हैं,

इतिहास खंगाल लेते हैं,

और कभी-कभी

अपने ही यक़ीन पर शक भी कर लेते हैं।


हालत इतनी बिगड़ गई है

कि बच्चे तक पूछने लगे हैं—

“क्यों?”

“कैसे?”

“किसलिए?”


नौकरी कर रहे हैं,

खुद के फैसले ले रहे हैं,

भीड़ से अलग चलने की कोशिश कर रहे हैं,

बराबरी अपनी जगह है भाईसाहब,

लेकिन “औक़ात” भी तो देखनी चाहिए?


कहते हैं—

“हम अपनी राह चुनेंगे!”

अरे,

राह चुनना कोई बच्चों का खेल है क्या?


गलियों में भटक जाते हैं,

हाइवे पर डर जाते हैं,

इतनी सोच में पड़ जाते हैं

कि कदम ही रुक जाते हैं।


और फिर—

जब आईने में

अपना चेहरा देखते हैं,

तो खुद से सवाल करने लगते हैं—

“मैं कौन हूँ?”

“मैं ऐसा क्यों हूँ?”


भाईसाहब!


ठीक कहते हैं आप—

सोचने में कच्चे हैं लोग अभी,

इन्हें अभी

भीड़ के साथ बहना आता है,

खुद के ख़िलाफ़ खड़ा होना नहीं आता।


लेकिन क्या दोष है उनका?

ये लोग

घर की उम्मीदें,

समाज की शर्तें,

डर की परतें,

सब साथ लेकर चलते हैं।


इनके दिमाग़ की डिग्गी में

पुराने डर,

टूटे हुए भरोसे,

और अधूरे सवाल पड़े होते हैं।


आज कच्चे हैं,

तो कल पक्के हो जाएँगे,

लेकिन ज़रा रहम कीजिए—

खुला छोड़ दीजिए रास्ता,

सवालों को साँस लेने दीजिए।


क्योंकि भाईसाहब—

यही लोग हैं

जो धीरे-धीरे

इस समाज को

सोचना सिखाएँगे।


आज नहीं तो कल,

कल नहीं तो परसों,

परसों नहीं तो नरसों—

सीख ही जाएँगे

अपने दिमाग़ को “चलाना”…


भाईसाहब!

लोगों के लिए

सोचना मुश्किल नहीं है,

बस

डर थोड़ा ज़्यादा है।


यह बात मैं इसलिए जानता हूँ—

क्योंकि एक सवाल ने ही

मुझे ला बिठाया है

कविता की “ड्राइवर सीट” पर…


वरना मैं भी

पीछे बैठा

वहीं जा रहा था

जहाँ आप जैसे भाईसाहब

मुझे ले जा रहे थे!


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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