जब दिन थोड़ा बचा रह जाता है
जब दिन थोड़ा बचा रह जाता है,
तो धूप
धीरे-धीरे अपने कदम समेटती है—
जैसे कोई बच्चा
खेल खत्म होने पर
चुपचाप घर लौटता हो।
गली के मोड़ पर
कुछ हँसी
अब भी अटकी रहती है,
हवा उसे छूकर
थोड़ा-सा चमका देती है।
पेड़ों की छाँव
लंबी साँस लेने लगती है,
और रास्ता
अपने ही क़दमों की आहट सुनता है।
मैं—
उसी किनारे खड़ा—
देखता हूँ
कैसे उजाला
अपने हिस्से का वादा निभाकर
धीरे-धीरे ओझल हो जाता है।
तब लगता है—
दिन पूरा नहीं गया,
बस
थोड़ा-सा मेरे भीतर
ठहर गया है।
और वही बचा हुआ हिस्सा
रात भर
किसी पुराने नाम की तरह
मन में
धीरे-धीरे पुकारता रहता है…
मुकेश ,,,,,,
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