भीड़ में समझदार होने की सज़ा
भीड़ में समझदार होना
कभी-कभी
सबसे बड़ी मूर्खता लगने लगता है।
जहाँ शोर ही तर्क हो
और तालियाँ ही प्रमाण,
वहाँ चुप रहना
एक तरह का अपराध माना जाता है।
तुम देखते हो
लोग दौड़ रहे हैं
बिना जाने कि कहाँ,
और तुम रुककर पूछते हो
"क्यों?"
बस यही "क्यों"
तुम्हें अलग कर देता है।
भीड़ को सवाल नहीं चाहिए,
उसे दिशा भी नहीं चाहिए,
उसे बस साथ चाहिए
अंधा, बेमतलब, बेवजह साथ।
और तुम
समझदार होने की बीमारी में
हर कदम नापते हो,
हर बात तौलते हो,
हर चेहरे के पीछे छिपी थकान पढ़ लेते हो।
इसलिए
तुम्हें पसंद नहीं किया जाता।
तुम्हें कहा जाता है
"ज़्यादा मत सोचो"
"लोग क्या कहेंगे?"
"थोड़ा नॉर्मल बनो"
और "नॉर्मल" का मतलब होता है
सोचना बंद कर दो।
समझदार होना
यहाँ एक सज़ा है
क्योंकि तुम झूठ में शामिल नहीं हो पाते,
तुम हँसी में शामिल नहीं हो पाते
जहाँ रोना छिपा होता है।
भीड़ में समझदार आदमी
अक्सर अकेला रह जाता है
जैसे कोई सच्चाई
गलत वक्त पर सामने आ गई हो।
और फिर
धीरे-धीरे
वह भी सीख जाता है
कभी-कभी
थोड़ा मूर्ख बन जाना ही
सबसे बड़ी समझदारी है…
— मुकेश
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