डायरी: अच्छा आदमी बनने का नाटक
दिन 1
आज मैंने फिर
“अच्छा” बनने की कोशिश की।
किसी की बात पर मुस्कुरा दिया
जहाँ सच में
मुझे गुस्सा आ रहा था…
दिन 7
लोग कहते हैं—
“तुम बहुत अच्छे हो…”
मैं हर बार
थोड़ा-सा असहज हो जाता हूँ।
क्योंकि
उन्हें मेरा सच नहीं पता।
दिन 15
आज मैंने
अपनी नाराज़गी छुपा ली।
सोचा—
अच्छे लोग
गुस्सा नहीं करते…
या
कम से कम
दिखाते नहीं।
दिन 25
मैंने “ना” कहना चाहा—
लेकिन
“ठीक है” कह दिया।
शायद
अच्छा आदमी
सबको खुश रखता है…
भले
खुद को नहीं।
दिन 40
अब मुझे समझ आ रहा है—
मैं अच्छा नहीं बन रहा,
बस
अच्छा दिखने की कोशिश कर रहा हूँ।
दिन 55
कभी-कभी
मैं अकेले में
खुद से पूछता हूँ—
“अगर कोई देख नहीं रहा हो,
तो क्या मैं ऐसा ही रहूँगा?”
और
जवाब
मुझे डरा देता है…
दिन 70
आज
किसी ने मेरी तारीफ़ की—
“तुम कभी किसी का बुरा नहीं सोचते…”
मैं मुस्कुरा दिया।
और भीतर
अपने ही झूठ पर
चुप हो गया।
दिन 90
अब
थकने लगा हूँ—
हर वक़्त
एक किरदार निभाते-निभाते।
अच्छा आदमी बनना
इतना मुश्किल नहीं है…
जितना
अच्छा आदमी “दिखना” है।
दिन 110
आज
मैंने पहली बार
थोड़ा-सा सच जिया—
किसी बात पर
चुप नहीं रहा।
किसी को
नाराज़ भी किया।
और
अजीब बात—
मुझे हल्का लगा।
दिन 130
शायद
अच्छा होना
और अच्छा दिखना
दो अलग बातें हैं।
एक
भीतर से आता है,
दूसरा
दूसरों की नज़रों से।
दिन 150 — अंतिम पन्ना
अब
मैंने तय किया है—
मैं
हर बार अच्छा नहीं बनूँगा।
हर बार सही नहीं दिखूँगा।
लेकिन
जो भी बनूँगा
सच बनूँगा।
अच्छा आदमी बनने का नाटक
सबसे थकाने वाला किरदार है
क्योंकि
इसमें
तुम दुनिया को तो खुश रखते हो,
लेकिन
खुद से
दूर होते जाते हो…
मुकेश ,,,
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