डायरी: ईश्वर से बिना मिले जीना (जहाँ आदमी पूरी तरह नास्तिक हो जाता है)
दिन 1
आज फिर मंदिर गया।
घंटी बजी, धूप जली, लोग झुके
मैं भी झुका…
पर भीतर
कुछ नहीं झुका।
दिन 9
लोग कहते हैं
“ईश्वर हर जगह है।”
मैंने हर जगह देखा…
बस अपने भीतर
नहीं दिखा।
दिन 18
मैंने प्रार्थना की
शब्दों में, मंत्रों में,
किताबों में लिखी हुई भाषा में…
लेकिन
मेरी चुप्पी
किसी तक नहीं पहुँची।
दिन 30
आज लगा
शायद ईश्वर
मिलने की चीज़ नहीं,
मान लेने की आदत है।
और मैं…
अब तक मान नहीं पाया।
दिन 45
भीड़ में खड़े लोग
रो रहे थे, माँग रहे थे,
कुछ पा भी रहे थे शायद…
मैं खड़ा था
खाली हाथ
और खाली मन के साथ।
दिन 60
कभी-कभी सोचता हूँ
अगर ईश्वर है,
तो वो मुझसे क्यों नहीं मिलता?
या
मैं ही उससे मिलने लायक नहीं हूँ?
दिन 75
मैंने आज
ईश्वर को ढूँढना बंद कर दिया।
थक गया हूँ
हर दरवाज़े पर
खुद को झुकाते-झुकाते।
दिन 90
अब मैं
बिना मिले ही
जीना सीख रहा हूँ।
जैसे
कोई ख़त
जो कभी पहुँचा ही नहीं,
फिर भी
लिखा गया था…
दिन 110
आज मंदिर के सामने से गुज़रा
कदम रुके नहीं।
न हाथ जुड़े,
न आँखें झुकीं
बस
एक सीधी चाल थी
और एक खाली-सा मन।
दिन 130
अब प्रार्थना नहीं करता।
न कोई मंत्र,
न कोई उम्मीद।
जो दिखता है
उसे मानता हूँ—
जो नहीं दिखता
उसे छोड़ देता हूँ।
दिन 150
आज पहली बार
“न होना”
सच लगा।
ईश्वर का नहीं
उस विचार का
जो मुझे बाँधे रखता था।
दिन 180 — अंतिम पन्ना
अब
मैं पूरी तरह अकेला हूँ
न कोई ऊपर है
न कोई सुन रहा है
न कोई देख रहा है…
और अजीब बात है—
अब डर नहीं लगता।
नास्तिक होना
शायद
ईश्वर को नकारना नहीं है
बल्कि
उसकी अनुपस्थिति को
स्वीकार कर लेना है…
ईश्वर से बिना मिले जीना
अब
न तलाश है
न प्रार्थना
बस
एक सादा-सा यक़ीन है—
कि
जो कुछ है
यहीं है…
और
यही पर्याप्त है।
मुकेश ,,,,
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