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Sunday, 5 April 2026

तुम्हारी हँसी और महुए के फूल

 तुम्हारी हँसी और महुए के फूल


तुम्हारी हँसी...

महुए के फूलों-सी गिरती है

चुपचाप,

बिना किसी शोर के,

पर पूरी हवा को मीठा कर देती है।


जैसे किसी सूखी दोपहर में

अचानक उतर आए

एक देसी-सा बसंत,

जिसका रंग आँखों से नहीं,

दिल से दिखता है।


तुम हँसती हो तो

लगता है

ज़मीन पर कुछ बिखर रहा है,

नर्म, सुनहरा,

जिसे समेटने को

मन झुक-झुक जाता है।


महुए की तरह ही

तुम्हारी हँसी भी

धीरे-धीरे चढ़ती है

पहले हल्की-सी मिठास,

फिर एक गहरी तासीर,

जो देर तक उतरती नहीं।


उसमें

कोई शहर की बनावट नहीं,

कोई बनावटी खनक नहीं—

बस एक देहाती सादगी,

जो सीधे रगों में उतरती है।


कभी-कभी

तुम्हारी हँसी सुनकर

ऐसा लगता है

जैसे कोई पुरानी याद

खुद चलकर पास आ बैठी हो—

बिना बुलाए,

बिना वजह।


और मैं…

हर बार सोचता हूँ—

कितना आसान होता

अगर हँसी को भी

महुए के फूलों की तरह

चुन कर रख लिया जाता,

किसी टोकरी में,

अपने दिनों के लिए।


पर तुम्हारी हँसी—

वो तो बस गिरती है,

महकती है,

और फिर

किसी अनदेखे मौसम में

खो जाती है।


मुकेश ,,,,,,,

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