होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 5 April 2026

ख़ामोशी

 

ख़ामोशी 


मैंने चुप रहकर भी बहुत कुछ कह दिया,

वो सुन न सका तो कसूर किसका था


मेरी ख़ामोशी, मेरी ज़ुबान थी।


हर बार उसने पूछा, “क्या हुआ है तुम्हें?”,

मैंने मुस्कुराकर बात टाल दी


कुछ जवाब औरतें बचाकर रखती हैं।


मैं बोलती तो शायद हल्का हो जाती,

पर चुप रही तो और गहरी हो गई


औरतें दर्द नहीं, अर्थ सँभालती हैं।

No comments:

Post a Comment