कुछ ख़ामोशियाँ
शब्दों की कमी से नहीं जन्मतीं,
वे भीतर के भर जाने की
धीमी, अनकही परिणति होती हैं
जैसे कोई नदी
अपने ही विस्तार से थककर
समुद्र में उतर जाती हो।
जब भीतर
सवाल अपनी उम्र पूरी कर लेते हैं,
और तर्क अपने ही घेरे में
बार-बार घूमकर चुप हो जाते हैं,
तब जवाब
शब्दों में नहीं उतरते—
वे एक गहरी ठहरन बनकर
आत्मा में टिक जाते हैं।
यह चुप्पी
किसी हार की नहीं होती,
न ही किसी डर की छाया—
यह तो उस क्षण की साक्षी है
जहाँ समझ
अपने अंतिम आकार में पहुँचकर
कुछ भी कहने से इंकार कर देती है।
होठों पर सन्नाटा होता है,
पर भीतर
एक उजाला लगातार जलता रहता है
स्पष्ट, निर्विवाद,
जिसे किसी प्रमाण की ज़रूरत नहीं।
अब कहना
मानो उस उजाले का अपमान हो,
और सुनना
एक अनावश्यक प्रयास
क्योंकि जो जाना जा चुका है,
वह अब कहा नहीं जा सकता।
ऐसी ख़ामोशी में
शब्द मरते नहीं,
बस मुक्त हो जाते हैं—
और मन
पहली बार
अपने ही भीतर
पूरी तरह सुनाई देने लगता है।
मुकेश ,,,,,,,
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