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Sunday, 5 April 2026

तुम्हारी तरफ़ जाता हुआ सन्नाटा

 तुम्हारी तरफ़ जाता हुआ सन्नाटा


सुनो…

अब मैं

तुम्हें लिखता नहीं,

बस

तुम्हारी तरफ़

एक सन्नाटा भेज देता हूँ।


वो सन्नाटा

जो पहले

अल्फ़ाज़ हुआ करता था,

जो हर रात

तुम्हारे नाम से

रौशन हो जाता था।


अब वही सन्नाटा

धीरे-धीरे

तुम तक जाता है

बिना दस्तक,

बिना आहट।


तुम्हारी चैट-विंडो में

अब कोई शोर नहीं होता,

बस एक ख़ालीपन है

जो शायद

मेरे हिस्से से गया है।


तुमने जवाब देना

छोड़ा नहीं

बस

जवाबों की ज़रूरत

ख़त्म कर दी है।


और मैंने

इंतज़ार करना

छोड़ा नहीं

बस

उसे सन्नाटे में बदल दिया है।


कभी-कभी

मैं स्क्रीन खोलता हूँ,

तुम्हारा नाम देखता हूँ,

और कुछ लिखे बग़ैर

वापस आ जाता हूँ

जैसे कोई दुआ

लबों तक आकर

रुक जाए।


तुम्हारी दुनिया में

शायद अब

कोई और आवाज़ है,

कोई और हलचल

और मेरी दुनिया में

तुम्हारे बाद

बस ख़ामोशी का

एक लंबा रास्ता है।


मगर अजीब बात है

ये सन्नाटा

खाली नहीं है,

इसमें

तुम्हारी याद की

हल्की-सी आहट रहती है।


जैसे

तुम अब भी कहीं हो

पर जवाब में नहीं,

बस एहसास में।


सुनो…


अगर कभी

तुम्हें लगे

कि कोई तुम्हें

बिना बुलाए याद कर रहा है,

तो समझ लेना

वो मेरा भेजा हुआ

सन्नाटा है

जो

अब भी

तुम्हारी तरफ़ जा रहा है…


मुकेश,,,,,,,,,

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