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Monday, 13 April 2026

वो जो मेरी प्रेमिका नहीं है (दो )

 वो जो मेरी प्रेमिका नहीं है

आज फिर याद आई

बिना किसी कारण के।


सुबह की चाय के साथ

अख़बार खोला था मैंने

पर अक्षरों के बीच

उसका चेहरा उतर आया


जैसे किसी ख़बर से नहीं

किसी ख़ाली जगह से निकली हो।


वो मेरी दिनचर्या का हिस्सा नहीं है

फिर भी

हर दिन में कहीं-न-कहीं

उसका एक कोना बना रहता है।


वो संदेश नहीं भेजती

न ही प्रतीक्षा करती है

पर जब भी

फ़ोन हाथ में लेता हूँ मैं

एक क्षण के लिए

उसका नाम याद आता है।


वो मेरी प्रेमिका नहीं है

इसलिए

हमारे बीच कोई वादा नहीं

कोई हिसाब नहीं

कोई शिकायत नहीं।


पर अजीब है

इन्हीं सब के न होने में

एक अजीब-सी उपस्थिति है

जो हर चीज़ के बीच

धीरे-धीरे बनी रहती है।


मैं जब थक जाता हूँ

दिन भर की भागदौड़ से

तो सोचता हूँ

अगर अभी उसके पास होता

तो कुछ नहीं करता

बस बैठा रहता।


वो भी शायद

कुछ नहीं कहती

बस अपनी उसी

गंभीर मुस्कान के साथ

पास बैठी रहती।


हम दोनों के बीच

कोई बड़ी बात नहीं होती

कोई गहरा संवाद नहीं


पर एक सन्नाटा होता

जो हमें

एक-दूसरे से जोड़ देता।


कभी-कभी सोचता हूँ

अगर वो मेरी प्रेमिका होती

तो क्या यह सब

इतना सहज रहता?


शायद नहीं।


शायद तब

हम भी बाकी लोगों की तरह

शब्दों में उलझ जाते

उम्मीदों में बँध जाते।


अभी

हमारे बीच कुछ भी तय नहीं है

और शायद यही

सबसे सच्चा है।


वो मेरे जीवन की

कोई कहानी नहीं है

जिसे मैं पूरा लिख सकूँ


वो एक एहसास है

जो आता है

और बिना शोर किए

ठहर जाता है।


शाम को

जब सूरज ढलता है

और रोशनी हल्की हो जाती है

तब उसका ख्याल

और साफ़ दिखता है


जैसे धूप कम होते ही

कुछ चीज़ें

और स्पष्ट हो जाती हैं।


वो जो मेरी प्रेमिका नहीं है

उसे खोने का डर नहीं

उसे पाने की चाह नहीं


फिर भी

वो कहीं गहराई में

बसी हुई है।


और मैं सोचता हूँ


कुछ रिश्ते

नाम नहीं माँगते,

बस एक जगह माँगते हैं

जहाँ वे चुपचाप

जीते रह सकें।


मुकेश ,,,,,,,

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