वो जो मेरी प्रेमिका नहीं है
आज उसी के घर गया था मैं।
शाम उतर रही थी धीरे-धीरे
और उसके घर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए
मुझे लगा
जैसे किसी जीवन में नहीं,
किसी ठहरे हुए समय में प्रवेश कर रहा हूँ।
घंटी बजाई—
दरवाज़ा खुला
और वह सामने थी
वही शालीनता
वही सधी हुई सादगी
और वही मुस्कान—
जो हँसी कम,
एक स्थायी भाव अधिक लगती है।
“आओ…”
उसने कहा—
जैसे कहने की ज़रूरत न हो
फिर भी कहा जाना चाहिए।
घर में कदम रखा तो
सब कुछ व्यवस्थित था
किताबें सीधी पंक्तियों में
कुर्सियाँ संतुलित
परदे आधे खुले
जैसे रोशनी भी
पूरी तरह भीतर आने से हिचकती हो।
यह घर बिखरा नहीं था
पर जिया हुआ भी नहीं था पूरी तरह।
हर चीज़ अपनी जगह पर थी
पर “अपनापन”
जैसे कहीं और रह गया हो।
वो चाय बनाने चली गई
और मैं बैठा रहा
उस सन्नाटे के बीच—
जो शोर नहीं करता
पर सुनाई देता है।
उसकी मेज़ पर रखी थीं कुछ किताबें
एक अधखुली डायरी
और एक पेन
जैसे शब्द यहाँ आते तो हैं
पर ठहरते नहीं।
वो लौटी
चाय के साथ
और अपनी उसी गंभीर मुस्कान के साथ
उसकी उम्र
उसके कपड़ों में नहीं
उसकी आँखों में थी
जहाँ अनुभव ने
भावनाओं को
धीरे-धीरे स्थिर कर दिया था।
“कैसे हो?”
उसने पूछा
“ठीक…”
मैंने कहा
और हम दोनों जानते थे
यह “ठीक”
एक उत्तर नहीं,
एक आदत है।
हमने बातें कीं
धीरे-धीरे
संयमित शब्दों में
कभी-कभी
वह चुप हो जाती
और मैं भी
जैसे दो लोग
बात नहीं,
एक ही मौन साझा कर रहे हों।
मैं उसे देखता रहा
वो जो मेरी प्रेमिका नहीं है
पर उसके सामने
मैं वैसा ही हो जाता हूँ
जैसा प्रेम में हुआ जाता है।
उसकी मुस्कान में
कोई आग्रह नहीं
कोई शिकायत नहीं
बस एक स्वीकृति है
जैसे उसने जीवन को
जैसा है
वैसा ही मान लिया हो।
मैं पूछना चाहता था
“तुम अकेली क्यों हो?”
पर पूछा नहीं
क्योंकि उसके घर की दीवारों ने
पहले ही कह दिया था
कि अकेलापन यहाँ समस्या नहीं,
एक व्यवस्था है।
शाम रात में बदल गई
लाइट जली
और उसके चेहरे पर
वही स्थिर उजाला आ गया
पर भीतर का जो अंधेरा था
वह वैसा ही रहा।
मैं उठने लगा
तो उसने बस इतना कहा—
“फिर आना…”
जैसे यह आग्रह नहीं,
एक औपचारिक सच्चाई हो।
मैं बाहर आ गया
पर वो घर
मेरे भीतर रह गया
उसकी सलीकेदार चुप्पी
उसकी सजी हुई उदासी
और वो स्त्री—
वो जो मेरी प्रेमिका नहीं है
पर उससे कम भी नहीं है—
जिसके घर में सब कुछ है
सिवाय उस अव्यवस्था के
जो जीवन को “जीवित” बनाती है।
और मैं सोचता हूँ—
कुछ रिश्तों को नाम नहीं दिया जाता,
क्योंकि नाम देने से
उनकी गहराई कम हो जाती है।
वो मेरी प्रेमिका नहीं है
पर शायद
मेरी सबसे सच्ची अनुभूति है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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