होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Tuesday, 14 April 2026

दिन भर जो नहीं कहा गया

दिन भर

जो नहीं कहा गया

रात उसे लिख देती है।


होंठों तक आकर

लौट गए थे जो लफ़्ज़,

वे काग़ज़ पर

चुपचाप उतर आते हैं।


मौन की तह में

जो दबा रह गया था,

वही स्याही बनकर

बहने लगता है।


कोई शोर नहीं

बस भीतर

एक हल्का-सा विस्फोट,

और एक पंक्ति

जन्म लेती है।


सुबह

सब कुछ सामान्य लगता है,

पर रात

अपना काम कर चुकी होती है।


मुकेश ,,,,,,,,,, 

No comments:

Post a Comment