दिन भर
जो नहीं कहा गया
रात उसे लिख देती है।
होंठों तक आकर
लौट गए थे जो लफ़्ज़,
वे काग़ज़ पर
चुपचाप उतर आते हैं।
मौन की तह में
जो दबा रह गया था,
वही स्याही बनकर
बहने लगता है।
कोई शोर नहीं
बस भीतर
एक हल्का-सा विस्फोट,
और एक पंक्ति
जन्म लेती है।
सुबह
सब कुछ सामान्य लगता है,
पर रात
अपना काम कर चुकी होती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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