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Tuesday, 14 April 2026

हर रात शब्दों की सूखी लकड़ियों में

 हर रात

शब्दों की सूखी लकड़ियों में

सुलगता है एक कवि।


दिन भर

वह चुप रहता है

लोगों की बातों में

अपने हिस्से की जगह

खाली छोड़ देता है।


पर रात होते ही

जब सब आवाज़ें

धीरे-धीरे सो जाती हैं

तब वह

अपने भीतर की झाड़ियों से

सूखे शब्द बटोरता है।


वे शब्द

जो दिन में काम नहीं आते,

जो बातचीत में

बेमेल लगते हैं,

जो किसी की समझ में

पूरे नहीं उतरते—

उन्हीं को वह

लकड़ियों की तरह

जमा करता है।


फिर

एक छोटी-सी चिंगारी—

किसी याद की,

किसी अधूरे स्पर्श की,

किसी अनकहे दर्द की—

और आग लग जाती है।


धीरे-धीरे

वे शब्द जलते हैं

और उनके साथ

वह भी—

कोई शोर नहीं होता

कोई लपट नहीं उठती

बस

अंदर ही अंदर

एक लंबी तपिश।


कभी कोई पंक्ति बनती है

तो लगता है—

जैसे राख में

अब भी थोड़ी गर्मी बची है।


कभी कुछ भी नहीं बनता

तो वह

उसी धुएँ में

अपना चेहरा छुपा लेता है।


सुबह होती है

तो लोग कहते हैं—

“कितना शांत है यह आदमी…”

उन्हें क्या मालूम—

रात भर

वह जलता रहा है

अपने ही शब्दों में।


हर रात

शब्दों की सूखी लकड़ियों में

सुलगता है एक कवि—

और हर सुबह

राख से उठकर

फिर सामान्य हो जाता है

जैसे कुछ हुआ ही न हो।


कवि आग नहीं दिखाता,

वह बस

राख में छुपी गर्मी

लोगों तक पहुँचा देता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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