उसे मेरे ख़ामोशियों का मतलब मालूम है
और मैं उसके शब्दों में उलझा हूँ।
वो जब मेरे सामने बैठती है
तो ज़्यादा बोलती नहीं
बस देखती है,
ठहर-ठहर कर,
जैसे हर लफ़्ज़ से पहले
मेरी चुप्पी को पढ़ लेना चाहती हो।
मैं कुछ कहता हूँ
आधे-अधूरे वाक्य,
बेमेल-सी बातें,
कभी बेवजह हँसी
वो मुस्कुरा देती है,
जैसे कह रही हो
“समझ गई…”
और मैं हैरान होता हूँ
कि मैंने तो कहा ही क्या था?
मेरी ख़ामोशी
उसके लिए
ख़त की तरह है
वो उसे खोलती है,
पढ़ती है,
और बिना जवाब लिखे ही
मुझे जवाब दे देती है।
पर जब वो बोलती है
तो उसके शब्द
सीधे नहीं होते,
उनमें तह होती है,
इशारे होते हैं,
रुकावटें होती हैं
और मैं…
बस उन्हीं में उलझा रह जाता हूँ।
वो कहती है
“कुछ बातें समझी जाती हैं…”
मैं पूछता हूँ
“पर कैसे?”
वो फिर मुस्कुरा देती है
और यही उसका जवाब होता है।
हमारे बीच
एक अजीब-सा रिश्ता है
वो मुझे
मेरे कहे बिना समझ लेती है,
और मैं
उसके कहे हुए में
मतलब ढूँढ़ता रह जाता हूँ।
कभी-कभी
मैं सोचता हूँ
क्या मैं सच में
उसे नहीं समझता?
या
मैं समझना
शब्दों में चाहता हूँ
और वो
महसूस करने में?
वो मेरे पास बैठती है
और कुछ नहीं कहती
पर उस “कुछ नहीं” में
इतनी बातें होती हैं
कि मैं
उनका हिसाब भी नहीं रख पाता।
मैं उससे कहता हूँ
“तुम साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहती?”
वो कहती है
“तुम सुनते कहाँ हो…”
और उस एक वाक्य में
जैसे
पूरी दूरी समा जाती है
सुनने और समझने के बीच की दूरी,
शब्द और एहसास के बीच की दूरी।
वो मेरी ख़ामोशियों का
मतलब जानती है
और मैं
उसके शब्दों में
मतलब ढूँढ़ता हूँ।
शायद यही फ़र्क है
वो महसूस करती है,
मैं समझना चाहता हूँ।
और इस बीच
एक ख़ूबसूरत-सी दूरी बनती है
जहाँ हम दोनों
एक-दूसरे के पास भी हैं,
और थोड़े-से दूर भी।
कुछ रिश्ते बोले नहीं जाते,
समझे जाते हैं
और कुछ लोग
समझे नहीं जाते,
बस महसूस किए जाते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment