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Wednesday, 22 April 2026

आदतों की मुलायम ज़िद

 आदतों की मुलायम ज़िद

आदतें

कभी ज़ोर से नहीं पकड़तीं,

बस उँगली थाम लेती हैं

और हम चलते रहते हैं।

वे शोर नहीं करतीं,

न ही कोई तर्क देती हैं,

बस धीरे-धीरे

हमारी चाल में उतर जाती हैं।

एक ही रास्ता

बार-बार चुन लेना,

एक ही चाय का स्वाद,

एक ही वक़्त पर लौट आना

यही उनकी नरम जिद है।

हम सोचते हैं

हम चुन रहे हैं उन्हें,

पर सच यह है

वे ही हमें

धीरे-धीरे चुन लेती हैं।

छोड़ने की कोशिश में

कुछ भी नहीं टूटता,

बस भीतर कहीं

हल्की-सी खाली जगह बनती है

जहाँ वे कभी रहती थीं।

और फिर

किसी दिन अनजाने में

हम लौट आते हैं वहीं

उसी मोड़ पर,

उसी एहसास के पास

जहाँ आदतें

बिना शिकायत

अब भी हमारा इंतज़ार कर रही होती हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,

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