घिसी हुई चप्पल
1
घिसी चप्पल
दरवाज़े पर रखी है
जैसे थकी हुई शाम
घर लौट आई हो।
2
उसके तले में
धूल ही नहीं,
कुछ अधूरे रास्ते भी
चिपके हुए हैं।
3
नई चप्पलें चमकती हैं,
पर ये पुरानी
पैरों की भाषा
बेहतर समझती है।
4
पट्टी ढीली है,
फिर भी साथ है
कुछ रिश्ते
इसी तरह टिके रहते हैं।
5
घिसते-घिसते
वो हल्की हो गई है
जैसे यादें
वक़्त के साथ नरम पड़ जाती हैं।
6
घिसी चप्पल
आवाज़ नहीं करती
बस रास्तों को
चुपचाप नापती रहती है।
7
उसकी एड़ी में
थोड़ा-सा झुकाव है
शायद किसी मोड़ पर
ज़्यादा ठहर गई थी।
8
बरसात में
फिसलती हुई भी
छोड़ती नहीं साथ
जैसे जिद्दी भरोसा।
9
धूप में तपकर
काली पड़ गई है
पर भीतर कहीं
अब भी नरमी बची है।
10
हर कदम पर
थोड़ी-सी आवाज़ करती है
जैसे बीते दिनों की
हल्की याद।
11
नई जोड़ी
अलमारी में रखी है,
और ये पुरानी
दहलीज़ पर राज करती है।
12
घिसे तलों में
समय की लकीरें हैं
कोई पढ़े तो
13
कभी टूटती है
फिर जुड़ जाती है
जैसे ज़िंदगी
अपने आप मरम्मत कर लेती है।
14
पैरों के साथ
उसका रिश्ता गहरा है
अब अलग होना
दोनों को अखरता है।
15
एक दिन
वो चुपचाप चली जाएगी
और दरवाज़ा
थोड़ा खाली लगेगा।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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