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Thursday, 9 April 2026

मौसी इस वक़्त मोबाइल चला रही होंगी…

 मौसी इस वक़्त मोबाइल चला रही होंगी…


मौसी इस वक़्त मोबाइल चला रही होंगी,

आँखों पर चश्मा टिकाए,

उँगलियों से स्क्रीन को सहलाती हुई,

जैसे कोई पुरानी तस्वीर टटोल रही हों

धीरे-धीरे…

चुपचाप…

एक लंबी, खिंची हुई दोपहर में,

थोड़ी थकी,

थोड़ी ठहरी हुई—

मौसी।


देखता हूँ उन्हें,

पूछता हूँ

“क्या कर रही हो मौसी?”


वो बिना नज़र उठाए कहती हैं

“बस… मोबाइल देख रही हूँ।”


“बस…”

एक छोटा-सा शब्द,

लेकिन भीतर कहीं

बहुत कुछ छुपा लेता है।


कभी उनकी रंगत रही होगी

दोपहर की धूप जैसी,

चेहरा—

जैसे किसी पुराने ज़माने की फिल्म की नायिका,

सादा, मगर असरदार।


उनकी चाल में अब भी बची है

वही ठहराव, वही तहज़ीब,

जैसे हर क़दम पर

कोई संस्कार चलता हो साथ।


पति को

शुगर और ब्लड प्रेशर

धीरे-धीरे खा गए,

जैसे वक़्त

बिना आवाज़ के खाता है सब कुछ।


और तब से

मौसी ने

अपनी हँसी को

धीरे-धीरे तह करके रख दिया है

किसी अलमारी में।


बेटा-बहू

अपने-अपने कमरों में

अपने-अपने जीवन में मस्त हैं,

बिटिया-दामाद

अपने घर की दुनिया में खुश।


सब पूछते हैं—

“मौसी, कैसी हो?”

वो कहती हैं

“ठीक हूँ।”


“ठीक हूँ…”

यह भी एक ऐसा जवाब है

जो अक्सर

ठीक नहीं होता।


बीमारियाँ

उनके पास बैठी रहती हैं

जैसे पुराने रिश्तेदार,

जिन्हें अब जाने का मन नहीं।


कभी घुटनों में दर्द,

कभी सिर भारी,

कभी दिल में

एक अजीब-सी खाली जगह।


फिर भी

सुबह की शुरुआत

पूजा से करती हैं मौसी,

घंटी की आवाज़ में

थोड़ा सुकून ढूँढती हैं,

अगरबत्ती के धुएँ में

कुछ यादें घोल देती हैं।


भगवान से क्या माँगती होंगी?

शायद

कुछ नहीं…

या शायद

बहुत कुछ।


मोबाइल में

कभी भजन सुनती हैं,

कभी किसी रिश्तेदार की फोटो देखती हैं,

कभी

बिना वजह

स्क्रीन को स्क्रोल करती रहती हैं


जैसे ज़िंदगी को

ऊपर-नीचे कर रही हों।


मैं कहता हूँ—

“मौसी, बाहर चलें? थोड़ा टहलते हैं!”


वो हल्की-सी मुस्कान के साथ कहती हैं

“तू जा… मैं यहीं ठीक हूँ।”


“यहीं ठीक हूँ…”

कितना बड़ा संसार है

इन तीन शब्दों के भीतर।


मौसी

धरती जैसी हैं

सबको थामे हुए,

सबका भार उठाए हुए,

और खुद

चुपचाप।


उनकी पीठ देखता हूँ,

हल्की झुकी हुई,

साड़ी का पल्लू

कंधे से सरकता हुआ,

एड़ियों में पड़ी दरारें,

और उन दरारों में

जमा हुआ समय।


अचानक

वो हँसती हैं

जैसे अपने ही दुःख को

थोड़ा धोखा दे रही हों।


कहती हैं

“अरे, मैं तो अभी और जीऊँगी!”


मैं मुस्कुरा देता हूँ,

लेकिन जानता हूँ—

जीना और

भरकर जीना

दो अलग बातें हैं।


कुछ देर बाद

फिर वही सन्नाटा,

फिर वही मोबाइल,

फिर वही उँगलियाँ

स्क्रीन पर चलती हुई।


मौसी क्या कर रही हैं दोस्तों?


.


.


.


मौसी इस वक़्त

“मोबाइल चला रही हैं”…


और शायद

ज़िंदगी को भी

थोड़ा-थोड़ा

चलाए जा रही हैं।


मुकेश ,,,,,,,,

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