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Thursday, 9 April 2026

मैं ही सवाल था, मैं ही जवाब निकला

 मैं ही सवाल था, मैं ही जवाब निकला


मैंने उम्र भर

सवालों के दरवाज़े खटखटाए,

हर चेहरे में

कोई जवाब ढूँढा।


कभी किताबों में,

कभी ख़ामोशियों में,

कभी भीड़ के शोर में

मैं खुद को ही पूछता रहा।


हर बार लगा

अब मिल जाएगा,

अब कोई बता देगा

मेरे होने का अर्थ।


पर जवाब

हर बार फिसल गया,

जैसे मुट्ठी में भरी रेत।


थककर एक दिन

मैं बैठ गया

बिना सवाल,

बिना उम्मीद।


और उसी ख़ामोशी में

कुछ खुला—

कोई बाहर से नहीं आया,

कोई शब्द नहीं बोले गए।


बस एक एहसास उठा

कि जिसे मैं ढूँढ रहा था,

वो कहीं गया ही नहीं था।


मैं ही वो प्रश्न था

जो खुद को समझना चाहता था,

और मैं ही वो उत्तर,

जो हमेशा से यहीं था।


अब न खोज है,

न उलझन

बस एक सुकून है,

जो कहता है


मैं ही सवाल था,

मैं ही जवाब निकला…


मुकेश ,,,,,,

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