होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Thursday, 9 April 2026

मैं हर रात उसी में लौटता हूँ,

 मैं हर रात उसी में लौटता हूँ,

जिसे मैं खोज रहा हूँ


दिन भर

मैं भटकता हूँ

चेहरों में,

रिश्तों में,

शब्दों के जंगल में।


कुछ ढूँढता हुआ,

जिसका नाम भी ठीक से नहीं जानता।


पर हर रात

जब सब थम जाता है,

और ख़ामोशी

अपनी चादर ओढ़ लेती है,

मैं लौट आता हूँ…

उसी जगह,

जहाँ से चला था।


अंदर

अपने ही सन्नाटे में,

जहाँ कोई और नहीं,

सिर्फ़ मैं होता हूँ।


और अजीब है

जिसे दिन भर बाहर खोजता हूँ,

वो वहीं बैठा मिलता है,

मेरी ही प्रतीक्षा में।


मैं उसे छू नहीं पाता,

बस महसूस करता हूँ

जैसे कोई

मुझमें ही बसा हो।


फिर समझ आता है—

सफ़र कहीं बाहर का नहीं था,

मैं तो बस

खुद तक लौटने की कोशिश में था।


मैं हर रात

उसी में लौटता हूँ,

जिसे मैं खोज रहा हूँ…


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment