पत्तों की सरसराहट और तुम्हारी बात
पत्तों की सरसराहट
जब हवा से छूकर गुजरती है,
कुछ कहती तो है
पर साफ़ नहीं,
बस एहसास भर छोड़ जाती है।
वैसी ही है
तुम्हारी बात
धीरे-धीरे उतरती हुई,
जैसे कोई राज़
दिल में खुल रहा हो।
मैं सुनता हूँ
हर हल्की आवाज़ में
तुम्हारे शब्द ढूँढता हूँ,
और हर खामोशी में
तुम्हारी मौजूदगी।
तुम जो कहती हो,
वो शब्दों से कम,
और एहसासों से ज़्यादा होता है।
पत्तों की उस हल्की थिरकन में
मैंने जाना है
कुछ बातें
कभी पूरी नहीं कही जातीं,
बस महसूस की जाती हैं।
अब जब भी
हवा पत्तों से गुज़रती है,
मैं मुस्कुरा देता हूँ
क्योंकि उसमें
तुम्हारी कोई अधूरी बात छुपी होती है…
पत्तों की सरसराहट
और तुम्हारी बात
दोनों ही
दिल को छूकर
धीरे-से खो जाती हैं
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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