नदी की लहरें और तुम्हारी चाल
नदी की लहरें
जब किनारों को छूती हैं,
एक लय बनती है
धीमी, निरंतर,
बिना रुके आगे बढ़ती हुई।
वैसी ही है
तुम्हारी चाल
न जल्दबाज़ी,
न ठहराव,
बस एक सधी हुई रवानी।
मैंने कई बार
उन लहरों में
तुम्हें चलते देखा है—
हर मोड़ पर
हल्का-सा मुड़ती हुई,
हर कदम पर
कुछ कहती हुई।
तुम्हारी चाल में
कोई शोर नहीं,
पर असर ऐसा
कि देर तक
दिल में गूँजता रहता है।
नदी बहती रहती है,
तुम चलती रहती हो
दोनों ही
अपने रास्ते पर,
पर दोनों में
एक-सी बात है—
न रुकना,
न पीछे मुड़ना,
बस आगे…
अपने ही सुर में।
नदी की लहरें
और तुम्हारी चाल
दोनों ही
देखते-देखते
मन को बहा ले जाती हैं
मुकेश ,,,,,,,,,
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