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Thursday, 9 April 2026

नदी की लहरें और तुम्हारी चाल

 नदी की लहरें और तुम्हारी चाल


नदी की लहरें

जब चुपचाप बहती हैं,

उनमें कोई जल्दी नहीं होती

बस एक सधा हुआ सफ़र।


वैसी ही है

तुम्हारी चाल

धीमी, मगर यक़ीन से भरी,

जैसे हर कदम

अपना रास्ता खुद जानता हो।


मैं किनारे खड़ा

तुम्हें देखता हूँ

कभी लहरों में,

कभी अपनी धड़कनों में।


तुम मुड़ती हो

तो जैसे नदी मोड़ लेती है,

तुम बढ़ती हो

तो जैसे पानी रास्ता बना लेता है।


न कोई शोर,

न कोई दिखावा

बस एक सहज-सी रवानी,

जो दिल को छूकर

आगे निकल जाती है।


और मैं…

हर बार वहीं रह जाता हूँ,

तुम्हारी उस चाल के पीछे

जैसे किनारा

नदी को जाते हुए देखता है…


नदी की लहरें

और तुम्हारी चाल

दोनों ही

बिना रुके

मुझमें बहती रहती हैं…


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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