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Thursday, 9 April 2026

खिड़की की धूप और तुम्हारी याद

 खिड़की की धूप और तुम्हारी याद


खिड़की से उतरती धूप

जब कमरे में फैलती है,

एक सुकून-सा रख जाती है

बिना आवाज़,

बिना वजह।


उसी रोशनी में

कभी-कभी

तुम्हारी याद भी चली आती है,

धीरे-धीरे,

जैसे कोई अपना।


तुम भी तो

ऐसी ही हो

नज़र नहीं आतीं,

पर हर कोने को

हल्का-सा उजाला दे जाती हो।


मैं उस धूप में

हथेलियाँ रखता हूँ,

जैसे तुम्हें छू लूँ

पर तुम भी,

और ये किरणें भी,

ठहरती कहाँ हो…


फिर भी—

दिन भर

वो हल्की गरमाहट रहती है,

जैसे तुम्हारा होना

कहीं पास ही हो।


खिड़की की धूप

और तुम्हारी याद

दोनों ही

आकर भी

कभी जाती नहीं…


मुकेश ,,,,,,,,,,

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