खिड़की की धूप और तुम्हारी याद
खिड़की से उतरती धूप
जब कमरे में फैलती है,
एक सुकून-सा रख जाती है
बिना आवाज़,
बिना वजह।
उसी रोशनी में
कभी-कभी
तुम्हारी याद भी चली आती है,
धीरे-धीरे,
जैसे कोई अपना।
तुम भी तो
ऐसी ही हो
नज़र नहीं आतीं,
पर हर कोने को
हल्का-सा उजाला दे जाती हो।
मैं उस धूप में
हथेलियाँ रखता हूँ,
जैसे तुम्हें छू लूँ
पर तुम भी,
और ये किरणें भी,
ठहरती कहाँ हो…
फिर भी—
दिन भर
वो हल्की गरमाहट रहती है,
जैसे तुम्हारा होना
कहीं पास ही हो।
खिड़की की धूप
और तुम्हारी याद
दोनों ही
आकर भी
कभी जाती नहीं…
मुकेश ,,,,,,,,,,
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