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Thursday, 9 April 2026

रात का सन्नाटा और तुम्हारी आवाज़

 रात का सन्नाटा और तुम्हारी आवाज़


रात का सन्नाटा

जब सब कुछ अपने भीतर समेट लेता है,

आवाज़ें थम जाती हैं,

पर सुनना बंद नहीं होता।


उसी ख़ामोशी में

कहीं दूर से

तुम्हारी आवाज़ उतरती है

धीरे-धीरे,

जैसे कोई याद पुकार रही हो।


तुम्हारी आवाज़

न तेज़, न धीमी,

बस इतनी कि

दिल तक पहुँच जाए।


मैं चुप बैठा रहता हूँ,

सुनता हूँ

उस सन्नाटे को—

जिसमें तुम बोलती हो।


अजीब है ये रिश्ता

तुम पास नहीं,

फिर भी

हर रात करीब हो जाती हो।


जब दुनिया सो जाती है,

तुम जाग उठती हो

मेरे भीतर कहीं…


रात का सन्नाटा

और तुम्हारी आवाज़

दोनों ही

ख़ामोशी में

सब कुछ कह जाते हैं…


मुकेश ,,,,,,,,,,

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