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Friday, 10 April 2026

नाच न जाने, आँगन टेढ़ा

 नाच न जाने, आँगन टेढ़ा


मनुष्य का स्वभाव बड़ा विचित्र है

वह अपनी सफलताओं का श्रेय स्वयं लेता है,

पर अपनी असफलताओं के लिए

कोई न कोई “आँगन” खोज ही लेता है,

जिसे वह टेढ़ा कह सके।


“नाच न जाने, आँगन टेढ़ा”

यह कहावत केवल हास्य नहीं,

बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे उस अहंकार का सूक्ष्म चित्र है,

जो अपनी कमियों को स्वीकार करने से कतराता है।


कल्पना कीजिए

एक नर्तक, जिसे लय का ज्ञान नहीं,

जिसके पाँव ताल से अनजान हैं,

वह जब आँगन में उतरता है,

तो नृत्य की सुंदरता उसके हाथ से छूट जाती है।


पर वह ठहरकर यह नहीं सोचता

कि शायद अभ्यास की कमी है,

या समझ की आवश्यकता है

वह तुरंत कह उठता है,

“आँगन ही टेढ़ा है!”


यही तो मनुष्य का सबसे सहज बहाना है

अपनी सीमाओं को छुपाने के लिए

परिस्थितियों को दोष देना।


हमारे जीवन में भी यह आँगन

कई रूपों में सामने आता है

कभी समय को दोष देते हैं,

कभी परिस्थितियों को,

कभी दूसरों को…

और कभी-कभी तो भाग्य को भी।


पर सच यह है

आँगन अक्सर सीधा ही होता है,

बस हमारे कदमों में ही संतुलन की कमी होती है।


यह कहावत हमें एक दर्पण देती है

जिसमें हम अपने भीतर की उस प्रवृत्ति को देख सकते हैं,

जो आत्मालोचन से बचना चाहती है।


आत्मस्वीकृति आसान नहीं होती।

अपनी कमियों को मान लेना

अहंकार को चोट पहुँचाता है।

पर यही चोट

विकास का पहला कदम भी बनती है।


जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं

कि नृत्य में कमी हमारी है,

तभी हम सीखने की ओर बढ़ते हैं।

अन्यथा हम जीवन भर

टेढ़े आँगन की शिकायत करते रह जाते हैं।


इस कहावत का सौंदर्य

इसके व्यंग्य में छिपा है

वह हमें हँसाते-हँसाते

हमारी सच्चाई से मिला देती है।


अंततः,

“नाच न जाने, आँगन टेढ़ा”

सिर्फ़ एक कहावत नहीं,

बल्कि एक चेतावनी है


कि अगर हम अपने भीतर झाँकने का साहस नहीं करेंगे,

तो हर आँगन हमें टेढ़ा ही दिखेगा…

और हमारा नृत्य

कभी पूर्ण नहीं हो पाएगा।


मुकेश ,,,,,,,,,

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