घर का भेदी लंका ढाए
कभी सोचा न था
दीवारें यूँ ढह जाएँगी,
जो अपने थे,
वही राह दिखाएँगे अँधेरों की ओर।
लड़ाई बाहर से होती,
तो शायद संभल जाते हम
पर ये वार भीतर से था,
जहाँ विश्वास की जड़ें लगी थीं गहरी।
तुम्हारी मुस्कान में
हमने सुकून पढ़ा था,
कहाँ पता था
वही लफ़्ज़ एक दिन
आग बन जाएँगे।
घर की चौखट पर
हमने जो दीप जलाए थे,
उन्हीं की लौ से
अपना ही आशियाना जलता देखा।
ये कैसी विडंबना है
दुश्मन से नहीं हारे हम,
अपनों की ख़ामोशी से हार गए।
तुम थे तो दीवारें मज़बूत थीं,
तुम ही से दरारें भी आईं
जैसे कोई चाबी
ख़ुद ताले का राज़ खोल दे।
कहते हैं—
“घर का भेदी लंका ढाए”…
अब समझ आया
लंका बाहर नहीं जलती,
वो भीतर राख होती है पहले।
विश्वास जब टूटता है,
तो आवाज़ नहीं करता
बस धीरे-धीरे
सब कुछ ख़ामोश कर देता है।
फिर भी—
इस राख में कहीं
एक चिंगारी बची रहती है,
जो सिखाती है—
कि घर बनाते वक़्त
दीवारों से ज़्यादा
दिलों को मज़बूत करना पड़ता है।
और भरोसा…
उसे हर रोज़ जीना पड़ता है,
वरना एक दिन
वही अपना
सब कुछ जला देता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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