जहाँ तलाश खत्म नहीं, बदल जाती है
मैं तुम्हें ढूँढता रहा
रास्तों में,
लोगों में,
उन आवाज़ों में
जो मेरे नाम से मिलती-जुलती थीं।
हर मोड़ पर लगा
अब तुम मिल जाओगे,
हर ठहराव ने कहा
बस यहीं कहीं हो तुम।
पर हर बार
तलाश थोड़ी और लंबी हो गई,
और मैं
थोड़ा और भीतर उतर गया।
एक दिन
थककर मैंने पूछ लिया
खुद से,
कि क्या सच में
तुम कहीं बाहर हो?
तभी
कुछ बदला
न दृश्य,
न समय,
न ही दुनिया की रफ़्तार
बस
तलाश की दिशा।
अब मैं तुम्हें
ढूँढता नहीं,
महसूस करता हूँ
उस खामोशी में
जो हर शोर के बाद बचती है,
उस खालीपन में
जो हर भराव के बाद आता है।
तुम अब
कोई मंज़िल नहीं,
कोई जवाब नहीं
तुम
वह सवाल हो
जो मुझे
खुद तक ले जाता है।
तलाश खत्म नहीं हुई
वह
अपने रूप बदल चुकी है
बाहर से भीतर,
चाहत से समझ तक,
और
इश्क़ से इबादत तक।
अब जब भी
मैं तुम्हें ढूँढता हूँ,
तो
खुद को पा लेता हूँ
और जब
खुद को खो देता हूँ,
तो
तुम मिल जाते हो।
जहाँ तलाश खत्म नहीं,
बस बदल जाती है
वहीं से
सफर शुरू होता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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