बहाव के विरुद्ध ठहरा हुआ एहसास
नदी अपने स्वभाव में थी—
बहती हुई,
बिना रुके,
बिना पीछे देखे।
और मैं…
उसी किनारे खड़ा
एक उलझन की तरह,
जहाँ सब कुछ आगे जा रहा था,
पर कुछ
जाने से इंकार कर रहा था।
तुम्हारा एहसास
कुछ ऐसा ही था
जैसे पानी के भीतर
एक पत्थर,
जो डूबकर भी
अपनी जगह से हिलता नहीं।
समय ने समझाया बहुत,
लहरों ने धक्का दिया,
हवाओं ने रास्ता दिखाया
कि छोड़ दो,
कि बह जाओ,
कि हल्का हो जाओ।
पर कुछ भाव
हल्के होने के लिए नहीं होते
वे
अपनी गहराई में
जड़ें उगा लेते हैं।
मैंने देखा है
बहाव के खिलाफ खड़े उस एहसास को
वह थकता नहीं,
टूटता नहीं,
बस
और अधिक स्पष्ट होता जाता है।
तुम अब कोई चाहत नहीं,
कोई अधूरा सपना नहीं
तुम
एक स्थिर सत्य हो,
जो हर बदलती लहर के बीच
अडिग खड़ा है।
जब सब कुछ
समय के साथ बदल जाता है,
तब भी
यह एहसास
अपनी जगह बनाए रखता है
जैसे
नदी के भीतर
एक शांत गहराई।
बहाव के विरुद्ध
ठहरा हुआ एहसास
संघर्ष नहीं करता
वह बस
अपने होने से
बहाव को अर्थ देता है।
मुकेश ,,,,
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