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Monday, 6 April 2026

बहते हुए समय में ठहरा हुआ नाम

 बहते हुए समय में ठहरा हुआ नाम


बहते हुए समय के किनारे

मैंने तुम्हें नहीं लिखा

तुम खुद ही

एक धड़कन की तरह

मेरे भीतर उतर आए।


घड़ी की सूइयाँ

अपनी आदत से मजबूर

आगे बढ़ती रहीं,

दिन

रात में बदलते रहे,

पर एक क्षण ऐसा था

जो कहीं गया ही नहीं

वह

तुम्हारा नाम था।


नदियाँ गुज़रती रहीं,

रास्ते बदलते रहे,

चेहरे आते-जाते रहे,

पर मेरे भीतर

एक जगह ऐसी रही

जहाँ समय ने

अपने कदम रोक दिए।


मैंने बहुत कोशिश की

तुम्हें भूलने की—

जैसे कोई

बहते पानी में

अपनी परछाईं मिटाना चाहता है,

पर हर बार

लहरें लौटकर

तुम्हें और साफ़ कर गईं।


तुम अब कोई स्मृति नहीं,

कोई घटना नहीं

तुम

एक ठहराव हो

जो हर बहाव के बीच

अपनी जगह बना लेता है।


जब भी

वक़्त तेज़ भागता है,

मैं वहीं लौट आता हूँ—

उस एक पल में,

जहाँ तुम हो,

और सब कुछ

थमा हुआ।


बहते हुए समय में

ठहरा हुआ नाम

मिटता नहीं

वह

समय को भी

धीरे-धीरे

अपने भीतर समेट लेता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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